चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के तहत आते विधानसभा चुराह क्षेत्र से जुड़े बहुचर्चित सवा करोड़ रुपये के सेब पौधों की खरीद-फरोख्त मामले में अब कानूनी कार्रवाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। इस मामले में 15 आरोपियों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है, जिनमें पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर सरकारी कर्मचारी तक शामिल हैं।
स्टेटस रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करेगी पुलिस
इन सभी आरोपियों ने पूर्व में उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत प्राप्त की थी, जो अब समाप्ति की कगार पर है। आठ आरोपियों की जमानत गुरुवार को समाप्त हो रही है, जबकि शेष सात की याचिकाओं पर 16 मई को सुनवाई होनी है।
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इसको लेकर आरोपी जमानत बढ़वाने की अर्जी के साथ शिमला की ओर रवाना हो चुके हैं। इसी के साथ पुलिस भी मामले में अब तक हुई जांच की स्थिति रिपोर्ट (स्टेटस रिपोर्ट) तैयार करके उच्च न्यायालय में प्रस्तुत करने जा रही है। पुलिस का उद्देश्य है कि अदालत में इस रिपोर्ट को आधार बनाकर आरोपियों को हिरासत में लेकर रिमांड पर भेजने की अनुमति मांगी जाए।
यह है मामला
यह मामला वर्ष 2022 में चुराह उपमंडल की सनवाल पंचायत में मनरेगा योजना के तहत सेब पौधों की आपूर्ति से जुड़ा है। लगभग 48,000 सेब पौधे खरीदने के लिए सवा करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, लेकिन बाद की जांच में सामने आया कि जमीन पर केवल 19,000 पौधे ही रोपे गए।
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सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जो पौधे लगाए भी गए, वे भी नियमानुसार तय स्थानों या बागवानी मानकों के अनुरूप नहीं लगाए गए थे। इस अनियमितता की शिकायत स्थानीय लोगों द्वारा प्रशासन और सरकार से की गई, जिसके बाद प्रशासनिक जांच का आदेश दिया गया।
जांच में पाई गई हेराफेरी
जांच में यह स्पष्ट हुआ कि पौधों की संख्या में भारी हेराफेरी की गई है और असल में लगाए गए पौधों की संख्या से तीन गुना ज्यादा का भुगतान कर दिया गया है। इसी आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई शुरू की। इस घोटाले में पंचायत प्रधान, उपप्रधान, पूर्व जिला परिषद सदस्य, पंचायत सचिव, कनिष्ठ अभियंता, रोजगार सेवक और वेंडर शामिल हैं।
हाईकोर्ट पर टिकी हैं सबकी निगाहें
अब सभी की निगाहें उच्च न्यायालय पर टिकी हैं। अदालत तय करेगी कि क्या आरोपियों की जमानत अवधि बढ़ाई जाएगी या फिर पुलिस को उन्हें गिरफ्तार कर रिमांड पर लेने की अनुमति दी जाएगी।
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पुलिस की तैयारी पूरी है और वह आरोपियों के खिलाफ मजबूत साक्ष्यों के साथ अदालत का दरवाजा खटखटा चुकी है। बहरहाल, यह मामला राज्य के पंचायत तंत्र और मनरेगा जैसी लोक-कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर दोष सिद्ध होते हैं, तो यह कार्रवाई पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक मजबूत संदेश दे सकती है।
