मंडी। हिमाचल प्रदेश के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में शिक्षा व्यवस्था पहले ही कई चुनौतियों से जूझ रही है। मगर अब मंडी जिले के सराज विधानसभा क्षेत्र से जो तस्वीर सामने आई है, उसने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक साथ 20 शिक्षक हुए रिटायर

यहां एक साथ 20 शिक्षकों के सेवानिवृत्त होने के बाद शिक्षा व्यवस्था लगभग चरमराने की कगार पर पहुंच गई है। 31 मार्च को निर्धारित सेवानिवृत्ति तिथि के चलते जैसे ही ये शिक्षक एक साथ रिटायर हुए, उसका सीधा असर स्कूलों पर पड़ा

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पढ़ाने वाला एक भी ही नहीं बचा

आंकड़ों के मुताबिक, सराज क्षेत्र में कुल 217 स्कूल संचालित हैं। मगर अब इनमें से करीब 10 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक मौजूद नहीं है। तीनों शिक्षा खंडों की स्थिति अलग-अलग होते हुए भी एक ही तरह से चिंताजनक है।

  • जंजैहली (सराज-1) में 8 शिक्षक रिटायर हुए, जिससे 5 स्कूल पूरी तरह खाली हो गए।
  • बालीचौकी (सराज-2) में 5 शिक्षकों के जाने से 2 स्कूलों में ताले जैसी स्थिति बन गई।
  • बगस्याड क्षेत्र में 7 शिक्षकों के रिटायरमेंट से 3 स्कूल बिना शिक्षक के रह गए।

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खाली हो गए स्कूल

लोगों का कहना है कि 31 मार्च को हुई रिटायरमेंट के बाद स्कूल ही खाली हो गए हैं। ग्रामीण इलाकों में स्कूल सिर्फ पढ़ाई का माध्यम नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य की नींव होते हैं। ऐसे में जब स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो पढ़ाई की कल्पना करना भी मुश्किल हो जाता है।

स्कूल पहुंच रहे बच्चे, लेकिन...

स्थानीय निवासी शिव दयाल बताते हैं कि कई स्कूलों में बच्चे रोजाना स्कूल तो पहुंच रहे हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाने वाला कोई नहीं है। इससे बच्चों का मनोबल भी टूट रहा है और अभिभावकों में गहरी चिंता है। कुछ जगहों पर तो बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो चुकी है।

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नहीं किया कोई सही इंतजाम

उप निदेशक प्रारंभिक शिक्षा हरि सिंह के मुताबिक, विभाग अस्थायी व्यवस्था के तहत दूसरे स्कूलों से शिक्षकों की ड्यूटी लगाकर काम चलाने की कोशिश कर रहा है। मगर लोगों का कहना है कि जमीनी हकीकत यह है कि दुर्गम क्षेत्रों में पहले से ही शिक्षकों की कमी रहती है। ऐसे में एक स्कूल से दूसरे स्कूल में शिक्षक भेजना भी स्थायी समाधान नहीं है।

राजनीति भी गरमाई

इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। जयराम ठाकुर ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पूरी तरह विफल साबित हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके अपने गृह क्षेत्र में ही स्कूल बिना शिक्षकों के चल रहे हैं, जो प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है।

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योजना की कमी या लापरवाही?

सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या विभाग को पहले से इन रिटायरमेंट्स की जानकारी नहीं थी? अगर थी, तो समय रहते नई नियुक्तियों की प्रक्रिया क्यों शुरू नहीं की गई?

सरकारी स्कूलों से उठ रहा भरोसा...

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसी तरह की स्थिति बनी रही, तो ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों पर से लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है और इसका सीधा असर शिक्षा के स्तर पर पड़ेगा।

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