बिलासपुर। छोटे से गांव की गलियों से, चला था एक सपना आंखों में लिए, कंधों पे उम्मीदों का आसमां था, दिल में कुछ कर दिखाने की रौशनी लिए। न धन था, न दौलत का कोई सहारा,
बस किताबों का संग और हौसलों का किनारा। रातों की नींदें पढ़ाई में खोईं, हर मुश्किल को मुस्कान से संजोई। ऐसा कुछ कर दिखाया है हिमाचल के एक होनहार बेटे ने।

गांव के बेटे की ऊंची उड़ान

शिक्षा, समर्पण और सतत परिश्रम जब किसी युवा की पहचान बन जाए, तो सीमाएं स्वत: ही बेमानी हो जाती हैं। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के छोटे से गांव जोल पलाखीं (कुठेड़ा) के रहने वाले अभिषेक चंदेल ने अपनी लगन से न केवल अपने गांव और जिला बल्कि पूरे प्रदेश का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है।

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मैक्सिको में करेगा PHD

अभिषेक का चयन मैक्सिको की शीर्ष अनुसंधान संस्था "सीनवेस्टाव" में नैनो विज्ञान एवं नैनो प्रौद्योगिकी (Nanoscience & Nanotechnology) विषय में डॉक्टरेट (PhD) के लिए हुआ है। यह प्रतिष्ठित पाठ्यक्रम 1 सितंबर 2025 से अगस्त 2029 तक चलेगा। इस अवधि में अभिषेक को मैक्सिकन सरकार की ओर से हर माह एक लाख रुपये के समकक्ष छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाएगी।

यूनिवर्सिटी उठाएगी पूरी जिम्मेदारी

सीनवेस्टाव संस्था की ओर से अभिषेक को भेजे गए औपचारिक पत्र में स्पष्ट किया गया है कि शिक्षा, रहने, खाने और अन्य शैक्षणिक आवश्यकताओं का पूरा खर्च यूनिवर्सिटी वहन करेगी। मैक्सिको के आव्रजन नियमों के अनुसार, जिन विद्यार्थियों को सरकार की ओर से छात्रवृत्ति प्राप्त होती है, उन्हें वीजा आवेदन में आर्थिक स्थिति का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं होती-बशर्ते उनके पास विदेश मंत्रालय की स्वीकृति हो।

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कार्यक्रम समन्वयक डॉ. साल्वादोर गेलार्डो हर्नांदेज ने भारत सरकार एवं भारतीय दूतावास से आग्रह किया है कि अभिषेक को अस्थायी छात्र वीजा शीघ्र प्रदान किया जाए, जिससे वह समय पर कार्यक्रम में सम्मिलित हो सके।

वैश्विक मान्यता प्राप्त विज्ञान संस्थान

"सीनवेस्टाव" मैक्सिको की सबसे प्रतिष्ठित बहु-प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थानों में गिनी जाती है, जो विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में उच्च स्तरीय शोध के लिए जानी जाती है। यह संस्था विश्वभर के प्रतिभाशाली युवाओं को अनुसंधान की ओर आकर्षित करती है और उन्हें वैश्विक स्तर के उपकरणों, प्रयोगशालाओं और मार्गदर्शकों का साथ देती है।

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प्रेरणा बने अभिषेक के प्रोफेसर

अभिषेक की इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे एक और अहम नाम है- बिलासपुर कॉलेज में कार्यरत फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार, जो पनोह गांव के निवासी हैं। डॉ. अरुण ने बताया कि अभिषेक पिछले तीन वर्षों से उनकी देखरेख में अध्ययन कर रहा था और उसमें नैनो विज्ञान के प्रति गहरी रुचि थी।

 

डॉ. अरुण के अनुसार, "मैंने जब देखा कि अभिषेक में शोध की वास्तविक जिज्ञासा है, तो मैंने उसे लगातार प्रोत्साहित किया। उसे बताया कि नैनो टेक्नोलॉजी एक ऐसा क्षेत्र है, जहां भविष्य की वैज्ञानिक क्रांतियां जन्म लेंगी।"

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पहले भी विदेशों में भेज चुके हैं होनहार विद्यार्थी

डॉ. अरुण कुमार का कहना है कि अब तक उनके मार्गदर्शन में 4 विद्यार्थी विदेशों में PHD के लिए जा चुके हैं, जिनमें से तीन अमेरिका और एक आबूधाबी में उच्च अध्ययन कर रहे हैं। वह हिमाचल के ग्रामीण क्षेत्रों में विज्ञान के प्रति युवाओं की सोच को बदलने के लिए लगातार प्रयासरत हैं।

 

पिछले तीन वर्षों में वे 50 से अधिक स्कूलों में विज्ञान जागरूकता कार्यक्रम कर चुके हैं। उनका मानना है कि यदि समय रहते छात्रों में विज्ञान की रूचि विकसित नहीं की गई, तो भविष्य में देश को नवाचार की दुनिया में मजबूत उपस्थिति दिलाना मुश्किल हो जाएगा।

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