शिमला। हिमाचल प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक तैयारियां तेज होती दिखाई देने लगी हैं। सत्ता में काबिज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि उन विधानसभा सीटों पर सेंध लगाने की भी है- जहां पिछले कई चुनावों से BJP ने अपनी पकड़ बनाए रखी है।
हिमाचल के सियासत में बड़ा खेल
विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों में कांग्रेस के पास 40 और BJP के पास 28 विधायक हैं। इन 28 BJP सीटों में 14 ऐसी विधानसभा सीटें हैं- जहां कांग्रेस पिछले दो या उससे अधिक चुनावों में जीत दर्ज नहीं कर पाई है। यही सीटें अब 2027 के चुनावी समीकरण में खास महत्व रखती हैं।
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BJP की सीटों पर कांग्रेस की नजर
इन सीटों की कहानी एक जैसी नहीं है। कहीं BJP के पास लगातार जीतने वाला मजबूत चेहरा है। कहीं पूर्व मुख्यमंत्री का प्रभाव है- तो कहीं कांग्रेस और BJP के बीच जीत का अंतर इतना कम रहा कि कुछ सौ या कुछ हजार वोट पूरे समीकरण को बदल सकते हैं। कई सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी हजारों वोट हासिल किए हैं- जिससे मुकाबले का गणित और पेचीदा हो जाता है।
सराज में जयराम ठाकुर सबसे बड़ी चुनौती
इन 14 सीटों में सबसे चर्चित नाम सराज का है। यहां BJP के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर लगातार चुनाव जीतते रहे हैं। 2012 से लगातार विधानसभा पहुंच रहे जयराम ठाकुर ने 2017 में करीब 11 हजार वोटों और 2022 में करीब 38 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। इसलिए सराज में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल BJP संगठन की नहीं है। यहां मुकाबले में जयराम ठाकुर का व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव भी अहम भूमिका निभाता है।
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किस तरह चुनौती देगी कांग्रेस?
2027 में कांग्रेस के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह इस सीट पर BJP के मजबूत आधार को किस तरह चुनौती देती है और क्या स्थानीय स्तर पर ऐसा राजनीतिक समीकरण तैयार कर पाती है- जो पिछले चुनावों से अलग तस्वीर पेश करे।
द्रंग में सिर्फ 618 वोट का अंतर
अगर किसी सीट को बेहद करीबी मुकाबले के लिहाज से देखा जाए तो द्रंग उसका बड़ा उदाहरण है। 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP के पूर्ण चंद और कांग्रेस के कौल सिंह ठाकुर के बीच जीत का अंतर महज 618 वोट रहा था। यानी यहां BJP की जीत जरूर हुई, लेकिन दोनों दलों के बीच फासला बेहद कम था।
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चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है बदलाव
ऐसे में 2027 में उम्मीदवार, संगठन और कुछ हजार वोटों का मामूली बदलाव भी चुनावी नतीजे पर असर डाल सकता है। द्रंग कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है- क्योंकि यहां उसे BJP से बहुत बड़ा वोट अंतर खत्म करने की जरूरत नहीं है।
सरकाघाट में तीसरे उम्मीदवार ने बिगाड़ा था गणित
सरकाघाट में भी 2022 का चुनाव दिलचस्प रहा। BJP के दलीप ठाकुर ने कांग्रेस के पवन कुमार को करीब 1,800 वोटों से पीछे छोड़ा था। वहीं तीसरे उम्मीदवार को करीब 10 हजार वोट मिले थे। यह आंकड़ा बताता है कि सीट का चुनावी गणित केवल BJP और कांग्रेस के बीच सीमित नहीं था। अगर आगामी चुनाव में तीसरे उम्मीदवारों की भूमिका बदलती है या उनका वोट किसी एक तरफ जाता है, तो दोनों प्रमुख दलों के बीच मुकाबले का समीकरण बदल सकता है।
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चुराह में BJP का लगातार दबदबा
चुराह में BJP के डॉ. हंसराज लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। 2012, 2017 और 2022- तीनों चुनावों में BJP ने यहां जीत दर्ज की। लगातार तीन चुनाव जीतने के कारण डॉ. हंसराज इस क्षेत्र में BJP के स्थापित राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल मौजूदा विधायक को हराने की नहीं, बल्कि लंबे समय से बने BJP के चुनावी आधार को तोड़ने की होगी। 2027 में यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस चुराह में अपने संगठन और उम्मीदवार के जरिए मुकाबले को कितना बदल पाती है।
कांग्रेस के सामने अपना वोट वापस लाने की चुनौती
सुलह विधानसभा क्षेत्र की तस्वीर भी कांग्रेस के लिए अलग तरह की चुनौती पेश करती है। 2022 में BJP के विपिन सिंह परमार को करीब 36 हजार वोट मिले थे। दूसरे नंबर पर कांग्रेस नहीं, बल्कि निर्दलीय उम्मीदवार जगजीवन पाल रहे थे। कांग्रेस उम्मीदवार करीब 7 हजार वोटों तक सीमित रहा। इस सीट पर कांग्रेस के लिए सवाल सिर्फ BJP के खिलाफ माहौल बनाने का नहीं है। उसे उन मतदाताओं तक भी पहुंच बनानी होगी, जिन्होंने पिछले चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया था।
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पच्छाद और चौपाल में निर्दलीय वोट अहम
पच्छाद और चौपाल भी ऐसी सीटें हैं, जहां तीसरे उम्मीदवारों ने चुनावी गणित को प्रभावित किया। पच्छाद में 2022 में BJP ने कांग्रेस को करीब 3,800 वोटों से हराया था, जबकि एक निर्दलीय उम्मीदवार को 13 हजार से अधिक वोट मिले थे। वहीं, चौपाल में BJP के बलबीर सिंह वर्मा करीब 5 हजार वोटों से विजयी हुए थे। यहां भी निर्दलीय उम्मीदवार को 13 हजार से ज्यादा वोट मिले।
दलों के बीच सीधी टक्कर...
ऐसे में इन दोनों सीटों पर 2027 का चुनाव केवल दो दलों के बीच सीधी टक्कर तक सीमित रहने की स्थिति में जरूरी नहीं है। तीसरे उम्मीदवारों की मौजूदगी और उनका प्रभाव भी परिणाम के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
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नाचन और बंजार में भी निर्दलीय वोटों का असर
नाचन में BJP के विनोद कुमार लगातार पार्टी का प्रमुख चेहरा रहे हैं। 2022 में BJP ने करीब 9 हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। लेकिन इस चुनाव में भी एक निर्दलीय उम्मीदवार को 10 हजार से अधिक वोट मिले। इसी तरह बंजार में BJP के सुरेंद्र शौरी करीब 4,300 वोटों से जीते थे, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार को करीब 15 हजार वोट मिले।
इन दोनों सीटों का चुनावी गणित यह संकेत देता है कि निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी कई बार मुख्य मुकाबले को प्रभावित कर सकती है। हालांकि पिछले चुनाव में मिले वोट अगली बार उसी तरह स्थानांतरित होंगे, ऐसा सीधे तौर पर मान लेना भी सही नहीं होगा।
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मंडी सदर में चेहरा बनाम पार्टी का समीकरण
मंडी सदर की राजनीति इन सीटों से कुछ अलग है। यहां अनिल शर्मा का अपना राजनीतिक प्रभाव रहा है। वह कांग्रेस और BJP दोनों के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं। 2022 में BJP के टिकट पर अनिल शर्मा ने कांग्रेस उम्मीदवार को करीब 10 हजार वोटों से हराया था। इसलिए मंडी सदर में पार्टी के साथ-साथ उम्मीदवार की व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ भी चुनावी समीकरण का अहम हिस्सा बनती है। 2027 में कांग्रेस के लिए यहां चुनौती सिर्फ BJP के संगठन से नहीं, बल्कि उम्मीदवार के व्यक्तिगत प्रभाव से भी होगी।
हमीरपुर सदर ने बदली थी पूरी कहानी
हमीरपुर सदर का 2022 का चुनाव हिमाचल की बदलती चुनावी राजनीति का एक अहम उदाहरण रहा। यहां BJP के पारंपरिक वोट आधार के बावजूद निर्दलीय आशीष शर्मा ने चुनाव जीता। बाद में वह BJP के टिकट पर उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।
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इस सीट ने यह दिखाया कि मजबूत राजनीतिक दलों के बीच मुकाबले में भी तीसरा उम्मीदवार कई बार पूरा चुनावी समीकरण बदल सकता है। इसलिए 2027 में हमीरपुर सदर पर BJP और कांग्रेस के साथ-साथ निर्दलीय या अन्य राजनीतिक विकल्पों की भूमिका भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
झंडूता और पांवटा साहिब में BJP की मजबूत पकड़
झंडूता में BJP लगातार तीन चुनावों से मजबूत स्थिति में रही है। जीत राम कटवाल लगातार दो बार विधायक बने और 2022 में BJP ने करीब 5,800 वोटों से जीत दर्ज की। दूसरी ओर पांवटा साहिब में सुखराम चौधरी ने 2022 में करीब 8,600 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी।
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कांग्रेस के सामने चुनौती
इन दोनों सीटों पर कांग्रेस के सामने चुनौती पुराने चुनावी आधार को तोड़ने की है। इसके लिए उम्मीदवार, संगठन और स्थानीय मुद्दों का चुनावी प्रभाव महत्वपूर्ण होगा। जोगिंद्रनगर में भी 2022 में BJP ने जीत दर्ज की थी, लेकिन जीत का अंतर करीब 4,300 वोट रहा। यह अंतर इतना बड़ा नहीं है कि इसे चुनावी मुकाबले से बाहर माना जाए।
अगर अगले चुनाव में वोटों का सीमित स्तर पर भी ध्रुवीकरण या स्थानांतरण होता है, तो सीट का परिणाम बदल सकता है। हालांकि अंतिम तस्वीर उम्मीदवारों और चुनाव के समय बनने वाले स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करेगी।
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14 सीटें, लेकिन 14 अलग-अलग चुनावी कहानियां
इन सभी सीटों को एक साथ देखने पर एक बात साफ होती है- कांग्रेस के सामने 14 सीटें जरूर हैं, लेकिन हर सीट की चुनौती अलग है। सराज में जयराम ठाकुर जैसा बड़ा राजनीतिक चेहरा है। चुराह में लगातार तीन जीत का सिलसिला है। द्रंग में महज 618 वोटों का अंतर है। सरकाघाट, पच्छाद, चौपाल, नाचन और बंजार में निर्दलीय उम्मीदवारों के वोटों ने पिछले चुनाव में समीकरण प्रभावित किया। मंडी सदर में व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण है, जबकि हमीरपुर सदर ने तीसरे उम्मीदवार की ताकत का उदाहरण पेश किया। यानी कांग्रेस के लिए इन सीटों पर एक जैसी चुनावी रणनीति काम करना आसान नहीं होगा।
2027 में किस तरफ जाएगा समीकरण?
2027 के विधानसभा चुनाव में इन 14 सीटों पर कई सवाल एक साथ सामने होंगे-
- क्या कांग्रेस करीबी मुकाबले वाली सीटों पर पिछले चुनाव का अंतर खत्म कर पाएगी?
- क्या वह उन सीटों पर अपना वोट वापस जोड़ पाएगी जहां निर्दलीय उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में मत हासिल किए थे?
- क्या BJP अपने मौजूदा विधायकों और मजबूत चेहरों के दम पर अपनी पकड़ कायम रख पाएगी?
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इन सवालों का जवाब चुनाव के समय बनने वाले राजनीतिक माहौल, उम्मीदवारों, स्थानीय मुद्दों और दोनों दलों के संगठन पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना जरूर है कि BJP की ये 14 सीटें 2027 के चुनाव में कांग्रेस की रणनीति के केंद्र में रह सकती हैं। इनमें कुछ सीटें ऐसी हैं जहां BJP का आधार लंबे समय से मजबूत है, जबकि कुछ जगहों पर पिछले चुनाव का अंतर बेहद कम रहा है।
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विधानसभा क्षेत्रों में भी होगा असली मुकाबला
यही वजह है कि 2027 की चुनावी कहानी केवल सत्ता और विपक्ष के बीच बड़े आंकड़ों से नहीं लिखी जाएगी। असली मुकाबला उन विधानसभा क्षेत्रों में भी होगा, जहां कुछ हजार वोटों का बदलाव पूरे चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। अब नजर इन 14 सीटों पर रहेगी-
- क्या कांग्रेस यहां BJP की पकड़ में सेंध लगा पाती है?
- क्या BJP एक बार फिर इन सीटों को अपने कब्जे में रखने में सफल रहती है?
