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October 2, 2026

जब कौल सिंह का टूट गया था CM बनने का सपना... बयां किया था दर्द; बोले-जब जरूरत थी जनता ने हरा दिया

8 बार विधायक, 4 बार मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष तक का रहा राजनीतिक सफर

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Kaul Singh Thakur

मंडी। हिमाचल की सियासत में एक ऐसा नाम, जिसके साथ मुख्यमंत्री की कुर्सी का सपना लंबे समय तक जुड़ा रहा। मंडी की राजनीति के कद्दावर नेता, आठ बार के विधायक, चार बार कैबिनेट मंत्री और हिमाचल विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष कौल सिंह ठाकुर ने कई बार सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे हर बार दूर रह गई।

 

कभी वीरभद्र सिंह के दौर में मुख्यमंत्री पद की चर्चा में रहे कौल सिंह ठाकुर का यह सपना 2022 के विधानसभा चुनाव में उस वक्त बड़ा झटका खा गया, जब द्रंग विधानसभा सीट से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी मुख्यमंत्री पद की उनकी राजनीतिक चर्चा पूरी तरह खत्म नहीं हुई। 2026 में पंडोह के एक कार्यक्रम में उन्होंने खुद कहा कि अगर वे 2022 का चुनाव जीत गए होते तो आज सुखविंदर सिंह सुक्खू की जगह मुख्यमंत्री होते। यही एक बयान अब कौल सिंह ठाकुर के लंबे राजनीतिक सफर, उनके अधूरे मुख्यमंत्री बनने के सपने और मंडी की सियासत में उनके प्रभाव को फिर चर्चा के केंद्र में ले आया है।

 

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आठ जीतों के बाद भी मुख्यमंत्री की कुर्सी रह गई दूर

कौल सिंह ठाकुर की राजनीति किसी सामान्य नेता की राजनीतिक यात्रा नहीं रही है। दशकों तक मंडी के द्रंग विधानसभा क्षेत्र की राजनीति पर उनका प्रभाव रहा। वह आठ बार विधायक चुने गए और चार बार प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। इसके अलावा उन्होंने हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। लेकिन इतने लंबे राजनीतिक अनुभव और संगठन में वरिष्ठता के बावजूद मुख्यमंत्री पद उनके हिस्से में नहीं आया। 

2012 में भी CM पद की चर्चा, पर पूरा नहीं हुआ सपना

कौल सिंह ठाकुर का मुख्यमंत्री बनने का सपना नया नहीं था। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले भी उनके नाम को मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में गिना जाता था। उस समय वीरभद्र सिंह की प्रदेश की सक्रिय राजनीति में वापसी के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी कौल सिंह ठाकुर तक नहीं पहुंच सकी। इसके बाद भी उन्होंने पार्टी में अपनी पकड़ बनाए रखी और सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। लेकिन राजनीति ने अगला बड़ा मोड़ 2017 में लिया।

 

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2017 में लगा बड़ा सियासी झटका

2017 के विधानसभा चुनाव में कौल सिंह ठाकुर को द्रंग से हार का सामना करना पड़ा। इसी चुनाव में उनकी बेटी चंपा ठाकुर भी मंडी विधानसभा सीट से चुनाव हार गईं। कौल सिंह ठाकुर की हार इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि लंबे समय तक द्रंग को उनका मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता रहा था। 2017 में भाजपा के जवाहर ठाकुर ने उन्हें हराया। हालांकि इसके बाद कौल सिंह की राजनीतिक सक्रियता खत्म नहीं हुई। वह संगठन और प्रदेश की राजनीति में लगातार सक्रिय रहे।

2022 में CM बनने की उम्मीद के साथ फिर मैदान में उतरे

2022 का विधानसभा चुनाव कौल सिंह ठाकुर के राजनीतिक जीवन का एक और अहम पड़ाव था। वरिष्ठता और लंबे राजनीतिक अनुभव के आधार पर उनके समर्थकों के बीच मुख्यमंत्री पद की संभावनाओं की चर्चा फिर तेज थी। कौल सिंह ठाकुर द्रंग से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन परिणाम उनके पक्ष में नहीं आया। चुनाव आयोग के परिणामों के मुताबिक द्रंग सीट पर भाजपा के पूरन चंद ने जीत दर्ज की। यही वह चुनाव था जिसके बाद कौल सिंह ठाकुर का मुख्यमंत्री बनने का सपना एक बार फिर अधूरा रह गया। 

 

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पांच दशकों का लंबा राजनीतिक सफर और एकछत्र साम्राज्य

कौल सिंह ठाकुर का राजनीतिक सफर बेहद लंबा और प्रभावशाली रहा है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1973 में सदर विकास खंड से पंचायत समिति का चुनाव जीतकर हुई थी, जहां वे सर्वसम्मति से चेयरमैन चुने गए थे। इसके बाद वर्ष 1977 में जनता दल के टिकट पर पहली बार विधायक बनकर उन्होंने विधिवत रूप से चुनावी राजनीति में कदम रखा। कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और 1982, 1985, 1993, 1998, 2003, 2007 और 2012 में लगातार विधायक चुनते हुए कुल आठ बार विधानसभा की दहलीज लांघी।

 

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अपने इस 50 साल लंबे सफर के दौरान उन्होंने राज्य योजना बोर्ड के अध्यक्ष, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री, संसदीय कार्य एवं कानून मंत्री, वर्ष 1993 में विधानसभा अध्यक्ष और दो बार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों की गरिमा बढ़ाई। द्रंग विधानसभा क्षेत्र में उनका एकछत्र साम्राज्य रहा और वे हिमाचल कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते रहे।

चुनावी झटके और वह हार जिसने बदल दी तस्वीर

हालांकि, राजनीति का पहिया हमेशा एक जैसा नहीं चलता और पिछले कुछ चुनावों ने कौल सिंह ठाकुर के राजनीतिक करियर की दिशा ही बदल दी। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें भाजपा के जवाहर ठाकुर के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त होकर द्रंग सीट से मैदान संभाला था, लेकिन उन्हें भाजपा के नए चेहरे और उनके ही राजनीतिक चेले रहे पूरन चंद के हाथों महज 618 वोटों से करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। यही नहीं, इस चुनाव में उनकी बेटी चंपा ठाकुर को भी मंडी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के अनिल शर्मा के खिलाफ 10,006 वोटों के भारी अंतर से हार का सामना करना पड़ा, जिससे इस पिता-पुत्री की जोड़ी को लगातार दूसरी बार जनता के नकारे जाने का दर्द झेलना पड़ा।

 

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पंडोह में बयान से गरमाई थी सियासत

अप्रैल 2026 में पंडोह में देवेंद्र ठाकुर को ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में कौल सिंह ठाकुर ने अपने राजनीतिक भविष्य और 2022 की हार को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि अगर वह पिछला चुनाव जीत गए होते तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वह होते। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में चुनाव लड़ने का अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान के निर्देशों के आधार पर होगा। कौल सिंह का यह बयान ऐसे समय आया जब हिमाचल में स्थानीय चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हुई थीं। इसी वजह से उनके बयान को प्रदेश की राजनीति में खास महत्व मिला।

फिर आया राजनीति से संन्यास का ऐलान

कौल सिंह ठाकुर का राजनीतिक सफर 2026 में एक और बड़े मोड़ पर पहुंचा। जुलाई में रोहतक स्थित संत रामपाल के आश्रम में उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति से हटने की घोषणा की। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए कहा कि समय परिवर्तनशील है और लोकतंत्र में नई सोच तथा नए नेतृत्व को आगे आना चाहिए। आठ बार विधायक और चार बार कैबिनेट मंत्री रह चुके कौल सिंह के इस ऐलान के बाद माना जाने लगा कि द्रंग की राजनीति में अब नई पीढ़ी के लिए रास्ता खुल रहा है।

 

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24 घंटे में बदला था राजनीतिक रुख

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। राजनीति छोड़ने की घोषणा के करीब 24 घंटे बाद ही कौल सिंह ठाकुर ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर कांग्रेस हाईकमान उन्हें भविष्य में चुनाव लड़ने को कहता है तो वह इससे इनकार नहीं करेंगे। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की राय जानने के लिए नवंबर में सम्मेलन आयोजित करने की बात भी कही।

द्रंग में कौल सिंह का प्रभाव क्यों रहा खास?

द्रंग विधानसभा क्षेत्र कौल सिंह ठाकुर की राजनीतिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। लंबे समय तक उन्होंने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया और क्षेत्र की राजनीति में उनका प्रभाव बना रहा। यही कारण है कि जब उनके राजनीतिक भविष्य की चर्चा होती है तो सबसे पहले द्रंग का नाम सामने आता है। 2026 में भी उनके बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में द्रंग से कांग्रेस की राजनीति किस दिशा में जाएगी और कौल सिंह ठाकुर की भूमिका क्या होगी।

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