शिमला। देवभूमि हिमाचल प्रदेश में सरकारी जंगलों और वन भूमि पर सालों से कुंडली मारकर बैठे अतिक्रमणकारियों के खिलाफ हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने अब तक का सबसे बड़ा हंटर चलाया है। माननीय अदालत ने अवैध कब्जाधारियों को पूरी तरह नेस्तनाबूत करने के लिए सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार को बेहद कड़े और समयबद्ध निर्देश जारी किए हैं।
अवैध कब्जाधारियों को दिया बड़ा झटका
हाई कोर्ट के इस कड़े रुख से उन लोगों को बहुत बड़ा झटका लगा है, जिन्होंने रसूख के दम पर या सालों से वन भूमि को अपनी जागीर समझ रखा था। अदालत ने न केवल जंगलों को खाली कराने का फरमान सुनाया है] बल्कि इसके लिए एक अंतिम समय सीमा (डेडलाइन) भी तय कर दी है, जिससे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रदेश की सभी वन भूमि को 31 दिसंबर 2026 तक पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त किया जाए।
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13 हजार से ज्यादा मामलों में हुई कार्रवाई
वन भूमि पर अवैध कब्जों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार ने अदालत में अपनी ताजा स्थिति रिपोर्ट पेश की। सरकार ने बताया कि राज्यभर में वन भूमि पर अतिक्रमण के 13,335 मामले दर्ज किए गए थे। इनमें से अब तक 7,925 अतिक्रमणकारियों को बेदखल किया जा चुका है, जबकि 5,410 मामले अभी भी लंबित हैं।
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रिपोर्ट पर संतोष जताते हुए अदालत ने कहा कि अब मामले की नियमित निगरानी की आवश्यकता नहीं है, लेकिन शेष अतिक्रमण को तय समय सीमा के भीतर हटाना सरकार की जिम्मेदारी होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी लंबित मामलों में कार्रवाई पूरी कर 31 दिसंबर 2026 तक वन भूमि को कब्जामुक्त किया जाए।
वन भूमि पर कब्जा कभी नहीं होगा नियमित
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दो टूक कहा कि वन भूमि पर किए गए अवैध कब्जों को नियमित करने का अधिकार राज्य सरकार के पास नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदेश सरकार की पांच बीघा तक अवैध भूमि को नियमित करने वाली नीतियां भी वन भूमि पर लागू नहीं होंगी।
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अदालत ने कहा कि जंगलों की जमीन विशेष श्रेणी की संपत्ति है और उसका उपयोग केवल कानून द्वारा निर्धारित उद्देश्यों के लिए ही किया जा सकता है। बिना वैधानिक अनुमति के वन भूमि का गैर-वन गतिविधियों के लिए इस्तेमाल पूरी तरह अवैध है।
भवन नहीं गिरेंगे] सरकार करेगी उपयोग
इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया है कि वन भूमि पर बने भवनों और अन्य निर्माणों को हर स्थिति में ध्वस्त नहीं किया जाएगा। हाईकोर्ट ने पूर्व में दिए गए आदेशों और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कब्जाई गई वन भूमि पर यदि किसी ने भवन, संरचना या अन्य निर्माण किया है तो वह संपत्ति सरकार या वन विभाग के अधिकार में मानी जाएगी। अर्थात, ऐसे निर्माणों का उपयोग भविष्य में हिमाचल प्रदेश सरकार या वन विभाग जनहित के कार्यों के लिए कर सकेगा। इससे सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए बिना उसका उपयोग सार्वजनिक हित में किया जा सकेगा।
एक पत्र से शुरू हुई थी बड़ी कानूनी लड़ाई
वन भूमि अतिक्रमण का यह मामला कोई नया नहीं है। इसकी शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी, जब कृष्ण चंद सारटा ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि प्रदेश के कई क्षेत्रों में जंगलों को काटकर अवैध रूप से घर, खेत और बगीचे विकसित किए जा रहे हैं।
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शिकायत के बाद हाईकोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया और समय-समय पर कई महत्वपूर्ण आदेश जारी किए। अदालत ने जंगलों को नुकसान पहुंचाकर तैयार किए गए अवैध बगीचों और कब्जों को हटाने के निर्देश भी दिए थे। इसके बाद राज्यभर में बड़े स्तर पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू हुई।
अब तेज होगी बेदखली अभियान की रफ्तार
हाईकोर्ट द्वारा स्पष्ट समय सीमा तय किए जाने के बाद अब सुक्खू सरकार और वन विभाग के सामने शेष 5,410 मामलों को निपटाने की बड़ी चुनौती है। माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में विभिन्न जिलों में अतिक्रमण हटाने के अभियान और तेज होंगे।
