मंडी। हिमाचल प्रदेश के सराज घाटी से आस्था और परंपरा से जुड़ी एक भावुक कर देने वाली खबर सामने आई है। यहां देव श्री मूल खुड्डी जहल महाराज के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हुए एक भक्त परिवार ने अपनी मनोकामना पूरी होने पर 2 बिस्वा भूमि देवता के नाम समर्पित कर दी है।

देवता को दान की जमीन

यह भूमि मंदिर और देवता के थड़ा निर्माण के लिए दान की गई है। गांव जासन, चैलचौक जिला मंडी निवासी चमन लाल और चमारी देवी ने बताया कि उन्होंने अपने पारिवारिक मसले के समाधान के लिए देवता से प्रार्थना की थी।

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देवता ने पूरी की मनोकामना

समय के साथ उनकी मनोकामना पूरी हुई, जिसे वे देव कृपा मानते हैं। आभार स्वरूप उन्होंने अपनी निजी भूमि में से 2 बिस्वा जमीन देवता को समर्पित कर दी। परिवार ने बाकायदा जमीन की रजिस्ट्री तैयार कर उसे देवता के कारदार शोभा राम ठाकुर को सौंप दिया है।

 

बनेगा भव्य मंदिर और थड़ा

कारदार ने दानी परिवार का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह दान केवल भूमि नहीं, बल्कि गहरी श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। दानी परिवार के सदस्यों का कहना है कि जिस स्थान पर भूमि दी गई है, वहां देवता विराजमान माने जाते हैं।

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भविष्य में यहां एक भव्य मंदिर और पारंपरिक थड़ा का निर्माण किया जाएगा, ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा मिल सके और देव परंपरा को सहेजा जा सके। परिवार को विश्वास है कि देवता की कृपा उनके साथ-साथ पूरे क्षेत्र के लोगों पर बनी रहेगी और यह स्थान आने वाले समय में आस्था का प्रमुख केंद्र बनेगा।

बर्फीले रास्तों से 130 किलोमीटर की पदयात्रा

उल्लेखनीय है कि देव श्री मूल खुड्डी जहल महाराज का मूलस्थान खुड्डीगाड़, कोठी बहली (सराज) में माना जाता है। हर वर्ष देवता करीब 130 किलोमीटर का सफर तय कर अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव में शामिल होते हैं।

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बर्फ से ढके कठिन पहाड़ी रास्तों से होकर देव रथ की यह यात्रा स्थानीय परंपरा और सामुदायिक आस्था का अद्भुत उदाहरण है। इस वर्ष भी देवता ने अपने पारंपरिक ठहराव स्थल पड्डल मैदान में पीपल के नीचे विराजमान होकर श्रद्धालुओं को दर्शन दिए।

 

शिवरात्रि में चढ़ा विदेशी मुद्रा का हार

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव के दौरान एक अन्य भक्त ने माता चंडी को अमेरिकी डॉलर से बना हार अर्पित किया था, जिसने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। यह दर्शाता है कि प्रदेश की देव संस्कृति केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर तक आस्था का संदेश पहुंचा रही है।

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आस्था और परंपरा का जीवंत संगम

सराज घाटी की यह घटना बताती है कि आज भी पहाड़ों में देव परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक जीवन का अहम हिस्सा है। यहां श्रद्धा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण के रूप में दिखाई देती है।

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