शिमला। महिला एकदिवसीय क्रिकेट विश्वकप में भारत को चैंपियन बनाने में निर्णायक भूमिका निभाने वाली हिमाचल की बेटी रेणुका सिंह ठाकुर आज जब अपने घर लौटीं, तो पूरा इलाका मानो जश्न में डूब गया।
हाटकोटी मंंदिर में चैंपियन रेणुका ने टेका माथा
दोपहर बाद वह सीधे प्रसिद्ध हाटकोटी माता मंदिर पहुंचीं, जहां उन्होंने विश्व विजेता बनने का श्रेय देवी की कृपा और अपने गांव-प्रदेश के लोगों के स्नेह को दिया। मंदिर परिसर में जैसे ही रेणुका पहुँचीं, ढोल-नगाड़े, लोकगीत, खिले चेहरे और “भारत माता की जय” के नारों से वातावरण गूंज उठा।
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कुछ देर तक चुपचाप खड़ी रहीं
मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने मां हाटकोटी के चरणों में माथा टेका और चुपचाप कुछ देर तक आंखें बंद किए खड़ी रहीं। देखने वाले कह रहे थे कि वह क्षण भावनाओं से भरा था-जैसे हर संघर्ष, हर अभ्यास और हर उम्मीद उन जोड़े हुए हाथों में सिमट आई हो।
मां ने लगाया गले, आंखें नम
रेणुका के घर लौटने की सूचना मिलते ही उनकी माता सुनीता ठाकुर भी परिवार व स्थानीय महिलाओं के साथ मंदिर पहुंचीं। बेटी को अपने सामने देखकर सुनीता ने फौरन उसे सीने से लगा लिया।
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दोनों मां-बेटी हुईं खामोश
यह आलिंगन सिर्फ स्वागत नहीं था, वह उन बरसों की मेहनत, चिंता, अकेलेपन और विश्वास का सौगात था। उस पल रेणुका की आंखें भी भर आईं। मां-बेटी चुप थीं, लेकिन उनकी चुप्पी में सालों की कहानी बोल रही थी।
मां के आशीर्वाद से मिली जीत
लोगों ने कहा आज रोहड़ू की बेटी नहीं, पूरा हिमाचल खिल उठा है। रेणुका ने कहा कि यह सिर्फ मेरी जीत नहीं, यह हिमाचल की जीत है। उन्होंने कहा कि महिला विश्वकप जीत पाना मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह सिर्फ मेरी मेहनत नहीं, इसमें मेरे कोच, मेरी मां, और आप सबका आशीर्वाद शामिल है। मैं आगे भी देश का नाम रोशन करने के लिए अपनी मेहनत और तेज रखूंगी।
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विश्वकप में चमकी रेणुका की गेंदबाजी
विश्वकप के दौरान रेणुका लगातार विरोधी टीमों के शीर्ष बल्लेबाजों को आउट कर टीम को शुरुआती बढ़त दिलाती रहीं। उनकी स्विंग और लाइन-लेंथ पर क्रिकेट जगत चर्चा कर रहा है।कई पूर्व खिलाड़ियों ने उन्हें भारत की भविष्य की लीड गेंदबाज बताया है।
संघर्षों से बनी चैंपियन
रेणुका के पिता का निधन तब हुआ था जब वह मात्र तीन वर्ष की थीं। पिता का सपना था कि बेटी क्रिकेटर बने। पिता के न रहने के बाद सुनीता ठाकुर ने अकेले ही घर और बेटी दोनों जिम्मेदारियां उठाईं। कभी खिलौनों की जगह क्रिकेट किट खरीदी गई, कभी त्योहारों पर खर्च रोककर टूर्नामेंट में जाने का किराया निकाला गया।
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स्थानीय युवाओं में नई ऊर्जा
उनकी वापसी पर सिर्फ स्वागत नहीं हुआ, एक नई प्रेरणा भी लौट आई। गांव के मैदानों में आज से फिर बल्ले-गेंद की आवाजें तेज होंगी। कई छोटी बच्चियां हाथ जोड़कर कह रही थीं कि मैं भी रेणुका दीदी जैसी बनूंगी।
