शिमला। हिमाचल प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में बीते कुछ महीनों में डॉक्टरों ने कई जटिल सर्जरी की हैं। कहीं डॉक्टरों ने महिला के पेट से 5 किलो रसौली निकाली है तो किसी डॉक्टर की टीम ने बच्चे की सफल सर्जरी कर उसे नया जीवन दिया है।

IGMC के डॉक्टरों का कमाल

इस कड़ी में अब IGMC के डॉक्टरों ने एक बार फिर प्रदेश ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के चिकित्सा क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। सीमित संसाधनों के बावजूद यहां के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने ऐसा कार्य कर दिखाया है, जिसे अब तक केवल चुनिंदा बड़े संस्थानों में ही संभव माना जाता था। इस उपलब्धि ने सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की क्षमताओं को लेकर नई उम्मीद जगाई है।

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कैंसर से जूझ रही थी मरीज

जानकारी के अनुसार 44 वर्षीय महिला पिछले कई महीनों से पेट दर्द, तेजी से घटते वजन और भोजन निगलने में कठिनाई जैसी गंभीर समस्याओं से परेशान थी। विस्तृत जांच और परीक्षणों के बाद उसमें गैस्ट्रिक कैंसर की पुष्टि हुई।

महिला को था पेट का कैंसर

बीमारी उन्नत अवस्था में थी, इसलिए पहले कीमोथेरेपी के जरिए ट्यूमर को नियंत्रित करने की कोशिश की गई। इसके बाद विशेषज्ञों ने सर्जरी को अंतिम और सबसे प्रभावी विकल्प माना। मरीज की स्थिति को देखते हुए सर्जिकल गैस्ट्रोएंटोलॉजी, एनेस्थीसिया और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की संयुक्त टीम तैयार की गई।

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छह घंटे चली जटिल प्रक्रिया

ऑपरेशन करीब छह घंटे से अधिक समय तक चला। सर्जनों ने लैप्रोस्कोपिक यानी दूरबीन तकनीक का उपयोग करते हुए पेट का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा सावधानीपूर्वक निकाल दिया। इसके बाद शेष हिस्से और आंतों को जोड़कर पाचन तंत्र का पुनर्निर्माण किया गया, ताकि मरीज सामान्य रूप से भोजन कर सके।

 

महिला मरीज की हुई सफल सर्जरी

90 प्रतिशत पेट निकाला बाहर

लैप्रोस्कोपी तकनीक में शरीर पर बड़े चीरे नहीं लगाए जाते, बल्कि छोटे छेदों के माध्यम से कैमरा और विशेष उपकरणों की मदद से सर्जरी की जाती है। इससे संक्रमण का खतरा कम होता है, रक्तस्राव सीमित रहता है और मरीज की रिकवरी अपेक्षाकृत तेज होती है।

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पहले 50 प्रतिशत तक ही संभव थी सर्जरी

आईजीएमसी में पहले भी लैप्रोस्कोपिक तकनीक से पेट की सर्जरी की जाती रही है, लेकिन अधिकतम 50 प्रतिशत हिस्से को हटाने तक ही प्रक्रिया सीमित थी। पहली बार इतने बड़े हिस्से को निकालकर सफलतापूर्वक पुनर्निर्माण करना चिकित्सा क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

 

विशेषज्ञों के अनुसार इतनी व्यापक सर्जरी के दौरान शरीर के आंतरिक अंगों को सुरक्षित रखना और बाद में उन्हें सुचारु रूप से जोड़ना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। टीम ने सावधानीपूर्वक कैंसरग्रस्त हिस्से को हटाकर शेष अंगों को पुनः संयोजित किया।

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ऑपरेशन सुरक्षित और सफल

इस जटिल सर्जरी को विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. वेद शर्मा के मार्गदर्शन में अंजाम दिया गया। टीम में सर्जिकल गैस्ट्रोएंटोलॉजी के सहायक प्रोफेसर डॉ. विपन शर्मा, डॉ. शुभम, डॉ. आशीष और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. मनोज शामिल रहे। सभी ने अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को सटीकता से निभाया, जिससे ऑपरेशन सुरक्षित और सफल रहा।

 

चिकित्सकों का कहना है कि ऐसे मामलों में सर्जन, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ और नर्सिंग स्टाफ के बीच तालमेल सबसे महत्वपूर्ण होता है। हर चरण की पूर्व योजना बनाई गई और उसी के अनुसार प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

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उत्तर भारत के सरकारी अस्पताल में पहली उपलब्धि

अस्पताल प्रशासन के अनुसार इस प्रकार की पूर्ण लैप्रोस्कोपिक नियर-टोटल गैस्ट्रेक्टॉमी आमतौर पर बड़े निजी अस्पतालों में की जाती है। उत्तर भारत के किसी सरकारी अस्पताल में इस स्तर की जटिल सर्जरी पहली बार सफलतापूर्वक की गई है। मरीज की हालत अब स्थिर है और डॉक्टरों के अनुसार वह तेजी से स्वस्थ हो रही है। जल्द ही उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी।

प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि

यह सफलता न केवल आईजीएमसी, बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। इससे यह स्पष्ट हुआ है कि राज्य के सरकारी संस्थान भी अत्याधुनिक तकनीकों और विशेषज्ञता के बल पर जटिल से जटिल सर्जरी करने में सक्षम हैं।

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