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July 20, 2026
हिमाचल: पिता का निधन..मल्टी टास्क वर्कर मां की बेटी ने रचा इतिहास; गांव की पहली डॉक्टर बनेगी प्रियंका
दो शिक्षकों की मदद से छोटे से गांव की बेटी ने रचा इतिहास, पूरा किया सपना
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शिमला। हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकलकर एक बेटी ने ऐसा मुकाम हासिल किया है, जो आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया है। सीमित संसाधन, आर्थिक चुनौतियां और पिता के निधन के बावजूद प्रियंका ने अपने सपनों को टूटने नहीं दिया। मां के अटूट हौसले, दो शिक्षकों के मार्गदर्शन और अपनी कड़ी मेहनत के दम पर उसने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) उत्तीर्ण कर अपने गांव की पहली डॉक्टर बनने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बढ़ा दिया है।
शिमला जिले के ठियोग क्षेत्र के एक छोटे से गांव किहरी की रहने वाली प्रियंका का सफर संघर्षों से भरा रहा। कुछ वर्ष पहले पिता का साया सिर से उठ गया था, जिसके बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई। मां एक सरकारी स्कूल में मल्टी टास्क वर्कर के रूप में कार्यरत हैं और सीमित आय में परिवार का पालन-पोषण करती हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद प्रियंका ने डॉक्टर बनने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत की। उसने कभी हालात को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें अपनी ताकत में बदल दिया।
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प्रियंका की मेहनत उस समय रंग लाई जब उसने अपने पहले ही प्रयास में NEET परीक्षा उत्तीर्ण कर शानदार प्रदर्शन किया। इस उपलब्धि ने न केवल उसके परिवार का बल्कि पूरे क्षेत्र का नाम रोशन कर दिया है। गांव के लोगों का कहना है कि पहली बार उनके गांव से कोई छात्रा डॉक्टर बनने की राह पर आगे बढ़ी है। प्रियंका की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो तो संसाधनों की कमी भी सफलता के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती।
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शैक्षणिक जीवन में भी प्रियंका लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करती रही। स्कूल के दिनों से ही वह मेधावी छात्राओं में गिनी जाती थी। उन्होंने सरकारी स्कूल से 10वीं की पढ़ाई पूरी की और फिर ठियोग के गर्ल्स स्कूल से 12वीं में मेडिकल स्ट्रीम में टॉप किया, जहां उन्होंने बायोलॉजी में 100 में से 100 अंक हासिल किए थे। विज्ञान विषयों में उसकी विशेष रुचि रही और इसी लगन ने उसे मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया।
आर्थिक तंगी के कारण परिवार प्रियंका को आगे सिर्फ बीएससी (B.Sc) करवाना चाहता था, क्योंकि उनके पास डॉक्टर की पढ़ाई के लिए न तो जानकारी थी और न ही संसाधन। ऐसे में प्रियंका की जिंदगी में दो शिक्षक स्कूल के हेडमास्टर रमेश नेगी और लेक्चरर प्रकाश शर्मा देवदूत बनकर आए।
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बायोलॉजी के शिक्षक प्रकाश शर्मा ने प्रियंका की प्रतिभा को पहचाना और हेडमास्टर रमेश नेगी के साथ मिलकर शिमला के एक निजी कोचिंग संस्थान एस्पायर से बात की। प्रियंका की काबिलियत को देखते हुए संस्थान ने उन्हें मुफ्त कोचिंग दी। यही नहीं] इन दोनों गुरुओं ने अपनी जेब से प्रियंका के हॉस्टल का करीब ₹9,000 का खर्च उठाया ताकि उनकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए। प्रियंका भावुक होकर कहती हैं कि अगर ये दोनों शिक्षक मेरी जिंदगी में नहीं होते, तो आज मैं इस मुकाम पर कभी नहीं पहुंच पाती।
नीट परीक्षा के नतीजों में प्रियंका ने 533 अंक हासिल किए हैं और एससी (SC) कैटेगरी में उनका ऑल इंडिया रैंक 1608 आया है। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले लीक हुए एग्जाम में भी प्रियंका ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 612 अंक हासिल किए थे, जिससे यह साफ होता है कि उनकी सफलता किसी तुक्के की मोहताज नहीं है। नीट पास करने के बाद सबसे बड़ा सवाल एमबीबीएस (MBBS) की महंगी फीस को लेकर था। लेकिन शिक्षक प्रकाश शर्मा ने इसका भी रास्ता निकाल लिया है। वे उड़ान नाम का एक ग्रुप चलाते हैं, जिसके सदस्य मिलकर प्रियंका की आगे की पढ़ाई और हॉस्टल की फीस का खर्च उठाएंगे।
बेटी की सफलता ने मां के वर्षों के संघर्ष को सार्थक कर दिया है। सीमित वेतन में परिवार चलाने वाली मां आज अपनी बेटी की उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रही हैं। उनका कहना है कि मेहनत और शिक्षा ही जीवन को नई दिशा दे सकती है और प्रियंका ने यह बात सच साबित कर दिखाई है। परिवार और गांव के लोगों ने भी इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए प्रियंका के उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।
प्रियंका की कहानी उन युवाओं के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जो संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी मान लेते हैं। उसने साबित कर दिया है कि मजबूत इच्छाशक्ति, मेहनत, परिवार का समर्थन और सही मार्गदर्शन मिलने पर कोई भी सपना असंभव नहीं होता। आज प्रियंका सिर्फ एक छात्रा नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और सफलता की मिसाल बन चुकी है। आने वाले वर्षों में जब वह डॉक्टर बनकर अपने गांव लौटेगी, तो उसकी उपलब्धि न केवल उसके परिवार बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय होगी।