मंडी। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो न केवल दिल दहला देने वाला है बल्कि व्यवस्था और संवेदनशीलता पर भी कई सवाल खड़े करता है। एक सड़क हादसे में माता-पिता ने अपने 18 वर्षीय बेटे को हमेशा के लिए खो दिया। जवान बेटे की मौत का दर्द परिवार के लिए किसी पहाड़ टूटने से कम नहीं था, लेकिन इस दुख को और गहरा तब कर दिया गया जब बीमा कंपनी ने मुआवजे के दावे को लेकर टालमटोल और बहानेबाजी शुरू कर दी।
मां बाप बीमा राशि को 6 साल भटके
करीब छह साल तक न्याय के लिए संघर्ष करने के बाद अब मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल सुंदरनगर ने पीड़ित परिवार को राहत देते हुए बीमा कंपनी को मुआवजा देने का आदेश सुनाया है। अदालत के फैसले को न सिर्फ परिवार के लिए न्याय बल्कि बीमा कंपनियों के लिए भी एक सख्त संदेश माना जा रहा है कि तकनीकी बहानों के सहारे अपनी जिम्मेदारियों से बचा नहीं जा सकता।
यह भी पढ़ें : वन भूमि पर कब्जा करने वालों की अब खैर नहीं, हाईकोर्ट के सुक्खू सरकार को सख्त निर्देश; तय की डेडलाइन
इंजीनियर बनने का सपना अधूरा रह गया
मामला वर्ष 2019 का है। मंडी जिले के कनैड़ क्षेत्र का रहने वाला 18 वर्षीय अविनाश सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमा का छात्र था और अपने भविष्य को लेकर कई सपने संजोए हुए था। 21 अक्तूबर 2019 की रात वह अपने एक मित्र के साथ मोटरसाइकिल पर जा रहा था। धनोटू के समीप अचानक बाइक अनियंत्रित होकर सड़क पर फिसल गई। हादसा इतना गंभीर था कि अविनाश को सिर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आईं। उपचार का मौका भी नहीं मिल पाया और उसकी मौत हो गई। इस हादसे ने परिवार की खुशियां एक पल में छीन लीं।
यह भी पढ़ें- हिमाचल पंचायत चुनाव में सगे भाई-बहन की बड़ी जीत : एक बना प्रधान, दूसरा उपप्रधान
मुआवजे के लिए भटकते रहे माता पिता
बेटे की मौत के बाद परिवार ने दुर्घटना बीमा क्लेम के लिए संबंधित बीमा कंपनी का दरवाजा खटखटाया। परिजनों को उम्मीद थी कि कम से कम कानूनी रूप से मिलने वाली सहायता उन्हें कुछ राहत देगी] लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीमा कंपनी ने दावा स्वीकार करने के बजाय कई तरह की आपत्तियां उठानी शुरू कर दीं। कंपनी ने दुर्घटना के लिए अलग-अलग तर्क पेश करते हुए अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया। मजबूर होकर माता-पिता को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
यह भी पढ़ें- हिमाचल पंचायत चुनाव में सगे भाई-बहन की बड़ी जीत : एक बना प्रधान, दूसरा उपप्रधान
ट्रिब्यूनल ने खारिज किए कंपनी के सारे बहाने
सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी की ओर से दावा किया गया कि दुर्घटना के समय बाइक चालक नशे की हालत में था। इसके अलावा बिना हेलमेट और अन्य परिस्थितियों का हवाला देकर मुआवजा देने से बचने की कोशिश की गई। हालांकि मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल सुंदरनगर ने रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों की विस्तार से जांच की। अदालत ने पाया कि बीमा कंपनी अपने दावों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सकी। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने कंपनी की दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और स्पष्ट किया कि मुआवजे का भुगतान करना बीमा कंपनी की जिम्मेदारी है।
यह भी पढ़ें- हिमाचल पंचायत चुनाव : पति-पत्नी ने मारी बाजी, एक को मिली प्रधान की कुर्सी- दूसरा बना वार्ड सदस्य
परिवार को मिलेगा 14.44 लाख रुपये का मुआवजा
मृतक छात्र के माता-पिता ने बेटे की असमय मृत्यु के बाद एक करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई और सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद ट्रिब्यूनल ने पीड़ित परिवार के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने बीमा कंपनी को 14 लाख 44 हजार 800 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। इसके साथ ही याचिका दायर किए जाने की तारीख से लेकर वास्तविक भुगतान तक इस राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देने को कहा गया है।
यह भी पढ़ें : हिमाचल: 35 साल से बिस्तर पर पड़ा था बुजुर्ग, सोशल मीडिया पर हुआ वायरल- अनुराग ठाकुर ने पहुंचाई मदद
फैसले ने दिया बड़ा संदेश
इस फैसले को केवल एक मुआवजा आदेश के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि यह उन परिवारों के लिए भी उम्मीद की किरण है जो दुर्घटनाओं के बाद कानूनी अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ते हैं। मंडी का यह मामला बताता है कि एक सड़क हादसा किसी परिवार की दुनिया उजाड़ सकता है, लेकिन जब पीड़ित परिवार को उसका वैधानिक अधिकार देने में भी बाधाएं खड़ी की जाएं तो दर्द कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में ट्रिब्यूनल का यह फैसला उन माता-पिता के जख्म तो पूरी तरह नहीं भर सकता जिन्होंने अपना जवान बेटा खो दिया, लेकिन न्याय जरूर दिला सकता है।
