शिमला। हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव पर अनिश्चितता के बादल गहराने लगे हैं। प्रदेश सरकार के हालिया कैबिनेट निर्णय जिसमें पंचायतों के पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन की मंजूरी दी गई है, से अब तय समय पर चुनाव कराना मुश्किल नजर आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक राज्य चुनाव आयोग सरकार के इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दे सकता है।

 

जानकारी के अनुसार चुनाव आयोग ने पिछले तीन महीनों से पंचायत चुनाव की तैयारियों को अंतिम रूप दे रखा था। 3 करोड़ पोस्टल बैलेट छप चुके हैं, मतदान सामग्री सभी जिलों के डीसी कार्यालयों तक पहुंचा दी गई है और 13 नवंबर को वोटर लिस्ट का अंतिम ड्राफ्ट प्रकाशित होना था। कैबिनेट के इस फैसले ने अब पूरे चुनावी कार्यक्रम पर संशय की स्थिति पैदा कर दी है।

 

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आयोग बोला- चुनाव संवैधानिक बाध्यता

सूत्रों के अनुसार राज्य चुनाव आयोग का मानना है कि पंचायतों का कार्यकाल 23 जनवरी को समाप्त हो रहा है, इसलिए उससे पहले चुनाव कराना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है। आयोग ने पिछले 10 महीनों में कई बार सरकार को पंचायत सीमाओं के पुनर्गठन और आरक्षण प्रक्रिया को समय रहते पूरा करने के लिए पत्र भेजे थे। लेकिन अब, पुनर्सीमांकन की प्रक्रिया शुरू होने से पूरा शेड्यूल प्रभावित हो सकता है। पुनर्गठन के बाद नई सीमाएं तय करना, वोटर लिस्ट दोबारा तैयार करना और ग्राम सभाओं में आपत्तियां आमंत्रित करना, इन सभी प्रक्रियाओं में कम से कम 3 महीने का समय लगना तय है।

 

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सेक्रेटरी ने पहले ही जारी किए थे आदेश

इससे पहले पंचायती राज विभाग के सचिव ने सभी जिलाधीशों को 25 सितंबर तक आरक्षण रोस्टर तैयार करने और ग्राम पंचायत स्तर पर तैयारी पूरी करने के निर्देश दिए थे। आयोग और विभाग दोनों ही चुनाव की तारीख तय होने से पहले की तैयारियों को अंतिम रूप दे रहे थे। अब कैबिनेट के इस फैसले ने आयोग और प्रशासन दोनों को उलझन में डाल दिया है।

क्या बोले स्टेट इलेक्शन कमिश्नर

स्टेट इलेक्शन कमिश्नर अनिल खाची ने बताया कि सरकार के निर्णय की प्रति आयोग को मिल गई है। उन्होंने कहा दृ श्हम पहले आदेश का गहन अध्ययन करेंगे। इसके बाद ही आगे की कार्रवाई या प्रतिक्रिया पर निर्णय लिया जाएगा।

 

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सरकार का दावा, तय समय पर होंगे चुनाव

वहीं, पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने सरकार के निर्णय का बचाव करते हुए कहा कि पंचायतों के पुनर्गठन का उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना और विकास योजनाओं को गांव.गांव तक पहुंचाना है। उन्होंने दावा किया कि सरकार की मंशा तय समय पर चुनाव कराने की ही है, और विभाग इसके लिए समानांतर रूप से तैयारियां करेगा। हालांकि, व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं दिखता। जानकारों का कहना है कि पुनर्सीमांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नई वोटर लिस्ट और आरक्षण रोस्टर लागू किया जा सकता है, जो जनवरी से पहले मुमकिन नहीं लगता।

 

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विपक्ष का हमला, हार के डर से भाग रही सरकार

विपक्ष ने इस फैसले को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस सरकार को ग्रामीण इलाकों में मिल रहे जनसमर्थन की हकीकत मालूम है, इसलिए वह पंचायत चुनावों को टालने के बहाने ढूंढ रही है। भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि जब चुनाव आयोग तैयार है, सारी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं, तो आखिरी वक्त में सीमांकन की बात क्यों उठाई गई। यह साफ संकेत है कि सरकार हार से डर गई है।

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