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May 24, 2026

सुक्खू सरकार का सबसे बड़ा फैसला: बदलेगा प्रदेश का प्रशासनिक नक्शा; तहसीलों-उपतहसीलों का होगा पुनर्गठन

सुक्खू सरकार प्रशासनिक पुनर्गठन के लिए आयोग बनाने की कर रही तैयारी

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CM Sukhu decision

शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार अपने कार्यकाल का सबसे बड़ा कदम उठाने जा रही है। प्रदेश की सुक्खू सरकार हिमाचल के पूरे प्रशासनिक नक्शे को दोबारा खींचने की एक बेहद महत्वाकांक्षी और संवेदनशील तैयारी में जुट गई है। कौन सा गांव किस तहसील का हिस्सा होगा] कौन सा इलाका किस उपमंडल (एसडीएम कार्यालय) के अधीन रहेगा, कौन सी उपतहसील बंद होगी और किन विकास खंडों (ब्लॉक) को आपस में मिलाया जाएगा यह सब तय करने के लिए राज्य सरकार जल्द ही एक उच्च स्तरीय पुनर्गठन आयोग का गठन करने जा रही है।

नए जिलों का हो सकता है गठन

आयोग प्रदेश भर की प्रशासनिक इकाइयों का अध्ययन कर यह तय करेगा कि किन क्षेत्रों में पुनर्गठन की आवश्यकता है, किन इकाइयों का विलय किया जा सकता है और किनकी सीमाओं में बदलाव जरूरी है। माना जा रहा है कि इसी प्रक्रिया के जरिए भविष्य में नए जिलों के गठन का रास्ता भी साफ हो सकता है। लंबे समय से नूरपुरए देहराए पालमपुर और रामपुर को जिला बनाने की मांग उठती रही है।

 

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सरकार को रिपोर्ट बनाकर देगा आयोग

वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में 81 उपमंडल, 92 विकास खंड तथा 193 तहसीलें और उपतहसीलें कार्यरत हैं। सरकार का मानना है कि इनमें से कुछ इकाइयों में पर्याप्त स्टाफ और संसाधनों का अभाव है, जबकि कई कार्यालय सीमित कार्यभार के बावजूद संचालित किए जा रहे हैं। आयोग जनसंख्या, भौगोलिक परिस्थितियों, प्रशासनिक आवश्यकता, लोगों की पहुंच और कार्यभार जैसे विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा। इसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

बदल सकती हैं प्रशासनिक सीमाएं

सरकार प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्निर्धारण पर भी विचार कर रही है। कई क्षेत्रों में ग्रामीणों को अपने तहसील मुख्यालय तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जबकि अन्य प्रशासनिक केंद्र उनसे अपेक्षाकृत अधिक निकट होते हैं।

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ऐसी स्थिति में गांवों और क्षेत्रों को नई प्रशासनिक इकाइयों से जोड़ा जा सकता है, जिससे लोगों को सरकारी सेवाओं तक पहुंच आसान हो सके। सरकार का तर्क है कि कई सीमाएं दशकों पहले की परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित की गई थीं, जबकि अब सड़क, परिवहन और आबादी के स्वरूप में काफी बदलाव आ चुका है।

नेताओं की जिद पर खोली कई इकाईयां

सुनने में यह व्यवस्था बहुत आदर्श लगती है कि जनता के लिए हर थोड़ी दूरी पर बड़े सरकारी कार्यालय खुल गए हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि पिछले कई सालों में ये इकाइयां व्यावहारिक जरूरत के बजाय राजनीतिक दबाव और स्थानीय विधायकों की जिद पर खोली गईं। आज इनमें से कई दफ्तर ऐसे हैं जहां जनता का काम बेहद कम है, लेकिन वहां भारी-भरकम बजट, ढांचागत खर्च और स्टाफ की जरूरत बनी हुई है। 

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राजनीतिक बहस का बन सकता है बड़ा मुद्दा

प्रशासनिक पुनर्गठन का यह प्रस्ताव आने वाले समय में राजनीतिक बहस का विषय भी बन सकता है। प्रदेश में नई तहसीलों और उपतहसीलों की घोषणा लंबे समय से राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देखी जाती रही है। विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में कई नई प्रशासनिक इकाइयों का गठन किया गया था। ऐसे में यदि किसी क्षेत्र की तहसील या उपतहसील का विलय किया जाता है अथवा उसका दर्जा प्रभावित होता है, तो स्थानीय स्तर पर विरोध की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। 

कई कार्यालयों में स्टाफ की कमी भी बड़ी चुनौती

प्रदेश की कई तहसीलें और उपतहसीलें वर्तमान में सीमित कर्मचारियों के सहारे संचालित हो रही हैं। कहीं नियमित तहसीलदार उपलब्ध नहीं हैं तो कहीं अधिकारी सप्ताह में कुछ दिन ही कार्यालय में बैठते हैं। ऐसे में प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा के साथ-साथ रिक्त पदों को भरने की मांग भी उठ रही है।

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प्रदेश के प्रशासनिक स्वरूप में हो सकते हैं बड़े बदलाव

यदि आयोग की सिफारिशों के आधार पर पुनर्गठन लागू होता है तो आने वाले वर्षों में हिमाचल प्रदेश का प्रशासनिक नक्शा काफी हद तक बदल सकता है। कई गांव नई तहसीलों या उपमंडलों में शामिल हो सकते हैं, सीमाएं बदल सकती हैं और प्रशासनिक व्यवस्था का नया स्वरूप सामने आ सकता है।

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