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May 22, 2026
हिमाचल हाईकोर्ट बोला- गंदी गाली देना नहीं कोई अपराध...जानें क्यों सुनाया ऐसा फैसला
अफसर के मामले को कोर्ट ने किया रद्द
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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आपराधिक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को email माध्यम से अपशब्द या गालियां भेजना हर परिस्थिति में आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि जब तक ऐसे संदेशों का स्पष्ट उद्देश्य किसी व्यक्ति को डराना, धमकाना या सार्वजनिक शांति भंग करना न हो,-तब तक केवल आपत्तिजनक भाषा के आधार पर अपराध स्थापित नहीं होता।
यह टिप्पणी न्यायाधीश जस्टिस संदीप शर्मा ने डॉ. तिलक राज शर्मा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की। अदालत ने मामले से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करते हुए कहा कि संबंधित email में प्रयुक्त भाषा भले ही बेहद अशोभनीय, गंदी और अपमानजनक थी। मगर सिर्फ इसी आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक कानून के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामले के अनुसार पालमपुर स्थित हिमाचल प्रदेश कृषि विश्विद्यालय में कार्यरत एक वरिष्ठ साइंटिफिक ऑफिसर ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उन्हें एक email मिला। जिसमें उनके और उनके परिवार के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक, अश्लील और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।
शिकायत में कहा गया कि email की भाषा मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाली थी और इससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने प्रारंभिक तौर पर मामला सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66-A के तहत दर्ज किया था।
जांच के दौरान पुलिस ने तकनीकी विश्लेषण के आधार पर पाया कि संबंधित email एक ऐसे IP एड्रेस से भेजा गया था- जो डॉ. तिलक राज शर्मा के नाम पर पंजीकृत BSNL कनेक्शन से जुड़ा हुआ था।
हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि जिस धारा 66-A के तहत मामला दर्ज किया गया है- उसे पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किया जा चुका है। पक्ष ने कहा कि जब संबंधित कानूनी प्रावधान ही अस्तित्व में नहीं है तो उसके तहत दर्ज आपराधिक मामला जारी नहीं रखा जा सकता।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि email की भाषा निश्चित रूप से सभ्य समाज के मानकों के अनुरूप नहीं थी। ऐसे में इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर अपमानजनक या अभद्र संदेश आपराधिक अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
अदालत ने कहा कि किसी कृत्य को आपराधिक मानने के लिए यह देखना आवश्यक है कि- उससे भय, धमकी, हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था फैलाने का इरादा जुड़ा हुआ था या नहीं। हाईकोर्ट के इस फैसले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साइबर कानूनों की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में साइबर संचार से जुड़े मामलों में एक अहम संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।