शिमला । हिमाचल प्रदेश अब एक नई और गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। राज्य की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate – TFR) लगातार गिर रही है और विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह रफ्तार ऐसे ही जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब यहां बच्चे और नौजवान दुर्लभ हो जाएंगे और प्रदेश बूढ़ों का प्रदेश बन जाएगा।
बूढ़ों का प्रदेश बन जाएगा हिमाचल
राष्ट्रीय प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य (RCH) कार्यक्रम के सलाहकार और फेडरेशन फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विस इंडिया (FRHS) के कार्यकारी सदस्य डॉ. नरेश पुरोहित ने बताया कि हिमाचल की मौजूदा औसत प्रजनन दर सिर्फ 1.5 है।
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तुलना के लिए देखें तो 2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 में यह 1.9 थी, जो 2019-21 के एनएफएचएस-5 में 1.7 पर पहुंची और अब और घटकर 1.5 हो गई है। आने वाले समय में नौजवानों की फौज कम हो जाएगी।
राष्ट्रीय औसत से भी नीचे
75 लाख की आबादी वाले इस पहाड़ी राज्य की TFR दर राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। हालांकि गोवा और सिक्किम की दर हिमाचल से भी नीचे है, लेकिन गिरावट की गति ने प्रदेश के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
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क्यों घट रही है प्रजनन दर?
- महिलाओं में बढ़ती साक्षरता: 2011 की जनगणना के अनुसार, महिलाओं की साक्षरता दर 75.9% है।
- गर्भनिरोधकों का अधिक उपयोग: 15 से 49 वर्ष की 75% महिलाएं गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करती हैं।
- शादी की उम्र में देरी: उच्च शिक्षा और करियर प्राथमिकता के चलते विवाह देर से हो रहा है।
- स्वास्थ्य समस्याएं: पीसीओएस (Polycystic Ovarian Syndrome), पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज और हार्मोनल विकारों में वृद्धि।
- जीवनशैली और पर्यावरणीय कारण: तनाव, प्रदूषण और असंतुलित खानपान भी प्रभाव डाल रहे हैं।
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वैश्विक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
भारत में हर चार में से एक दंपत्ति को गर्भधारण में कठिनाई होती है। यह समस्या खासकर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ज्यादा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जागरूकता और स्वास्थ्य सुधार की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहराएगा।
समाधान की जरूरत
- युवाओं और दंपत्तियों के लिए प्रजनन स्वास्थ्य पर शैक्षिक अभियान चलाए जाएं।
- जीवनशैली सुधार, पोषण और नियमित स्वास्थ्य जांच पर ध्यान दिया जाए।
- बांझपन और गर्भधारण से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए ग्रामीण व शहरी दोनों क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम हों।
