लाहौल-स्पीति। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में बिना बारिश के लगातार हो रहे लैंडस्लाइड ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। घाटी के उदयपुर क्षेत्र में कुदरत का कहर देखने को मिला।
हिमाचल में दरका पहाड़
यहां सड़क संपर्क और जनजीवन दोनों को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। लगातार दरक रही पहाड़ियों के बीच अब जाहलमा पुल का एक हिस्सा भी टूटकर गिर गया है, जिससे पूरे इलाके का संपर्क प्रभावित हो गया है।
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सुबह-सवेरे भारी लैंडस्लाइड
जानकारी के अनुसार, तांदी-संसारी मार्ग पर पिछले तीन दिनों से रुक-रुक कर भारी चट्टानें गिर रही थीं। प्रशासन ने खतरे को देखते हुए इस मार्ग पर सुबह सात बजे से शाम सात बजे तक ही आवाजाही की अनुमति दी थी, लेकिन हालात लगातार बिगड़ते गए।
भारी भूस्खलन से टूटा पुल
आखिरकार पहाड़ी का बड़ा हिस्सा दरकने से जालहमा पुल का एक सिरा ढह गया और मार्ग पूरी तरह बंद हो गया। स्थानीय लोगों के अनुसार लैंडस्लाइड इतना भयावह था कि पहाड़ी से विशाल चट्टानें सड़क पर गिरती रहीं, जिससे सड़क में भी बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गईं।
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एक हफ्ते तक रास्ता बंद
सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में पहाड़ी से लगातार गिरता मलबा और टूटता पुल साफ दिखाई दे रहा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि यह मार्ग कम से कम एक सप्ताह तक बंद रह सकता है।
नदी में समाई कार
इसी बीच मूलिंग में भी देर रात बड़ा हादसा होते-होते टल गया। यहां अचानक हुए लैंडस्लाइड की चपेट में आने से एक कार नदी में जा गिरी। कार में चालक अकेला सवार था। हादसे की सूचना मिलते ही स्थानीय लोग और पुलिस टीम मौके पर पहुंची और चालक को सुरक्षित बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया।
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खतरे से खाली नहीं सफर
स्थानीय लोगों का कहना है कि मूलिंग क्षेत्र में अक्सर लैंडस्लाइड की घटनाएं होती रहती हैं और यहां सफर करना हमेशा खतरे से खाली नहीं रहता। मंगलवार दिन में भी यहां पहाड़ी से भारी चट्टानें गिरने के कारण लेह-मनाली नेशनल हाईवे कई घंटों तक बंद रहा था।
केलांग-मनाली से संपर्क कटा
उधर, जाहलमा पुल के टूटने से उदयपुर क्षेत्र का संपर्क अब केलांग और मनाली से लगभग कट गया है। लोगों को अब हिमाचल के अन्य हिस्सों तक पहुंचने के लिए पांगी और साच पास होते हुए लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ेगा, जिससे यात्रा में करीब दो दिन अतिरिक्त लग सकते हैं।
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लोगों की बढ़ी चिंता
लगातार हो रहे भूस्खलन ने प्रशासन और स्थानीय लोगों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम और पहाड़ों में बढ़ती भू-संवेदनशीलता के कारण ऐसे हादसे अब अधिक खतरनाक रूप लेते जा रहे हैं।
