शिमला। हिमाचल प्रदेश में बीते रोज हुए निकाय चुनावों के परिणाम रविवार देर शाम तक सामने आते ही प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई। इस बार नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों में कई चौंकाने वाले नतीजे देखने को मिले, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा दो बड़े राजनीतिक गढ़ों की हार-जीत को लेकर हो रही है।

प्रदेश कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं स्वर्गीय राजा वीरभद्र सिंह और स्वर्गीय जीएस बाली के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा ने ऐसी सेंध लगाई है] जिसने आने वाले 2027 विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है। 

 

एक तरफ रामपुर बुशहर में पहली बार भाजपा समर्थित पार्षदों ने बहुमत हासिल कर कांग्रेस का दशकों पुराना दबदबा तोड़ा, तो दूसरी ओर कांगड़ा जिले के नगरोटा बगवां में भी भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने कांग्रेस को सीमित कर बड़ा राजनीतिक संदेश दे दिया।

वीरभद्र सिंह के गढ़ में पहली बार भाजपा का बहुमत

शिमला जिला की रामपुर बुशहर नगर परिषद को स्वर्गीय वीरभद्र सिंह का राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है। रामपुर सिर्फ एक नगर परिषद नहीं] बल्कि कांग्रेस की उस मजबूत विरासत का प्रतीक रहा है] जहां वर्षों तक “राजा साहब” का राजनीतिक प्रभाव कायम रहा। लेकिन इस बार के निकाय चुनावों ने यहां पूरी तस्वीर बदल दी।

 

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रामपुर में 5 सीटों पर भाजपा का कब्जा

नौ वार्डों में हुए चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने 5 सीटों पर कब्जा जमा लिया, जबकि कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार केवल 4 सीटों तक सिमट गए। भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने वार्ड नंबर-2, 5, 6, 7 और 8 में जीत दर्ज की। वहीं कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी वार्ड नंबर-1, 3, 4 और 9 से विजयी रहे।

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नगर परिषद के इतिहास में यह पहला मौका माना जा रहा है जब भाजपा समर्थित पार्षदों ने यहां बहुमत हासिल किया हो। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम केवल निकाय चुनाव का आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी है।

क्या कमजोर पड़ रही है वीरभद्र परिवार की पकड़?

रामपुर के नतीजों के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि क्या स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के बाद कांग्रेस की पारंपरिक पकड़ कमजोर पड़ने लगी है? प्रदेश सरकार में मंत्री और वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह के लिए इन चुनाव परिणामों को बड़ी राजनीतिक चेतावनी माना जा रहा है।

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ग्राउंड स्तर पर चर्चा यह है कि कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे खिसक रहा है और भाजपा लगातार संगठनात्मक रूप से अपनी जमीन मजबूत कर रही है। यही वजह है कि जिस रामपुर को कभी कांग्रेस का अभेद्य किला माना जाता था, वहां अब भाजपा ने राजनीतिक पैर जमा लिए हैं।

जीएस बाली के क्षेत्र में कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमटी

कांगड़ा जिला की नगरोटा बगवां नगर परिषद के नतीजों ने भी कांग्रेस खेमे की चिंता बढ़ा दी है। यह क्षेत्र स्वर्गीय जीएस बाली का राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन इस बार यहां भी भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने शानदार प्रदर्शन किया। सात वार्डों वाली नगर परिषद में भाजपा समर्थित प्रत्याशियों ने 4 सीटों पर कब्जा जमाया, जबकि कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार केवल 2 सीटें ही जीत पाए।

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एक सीट निर्दलीय प्रत्याशी के खाते में गई। हालांकि दिलचस्प बात यह रही कि प्रधान पद अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित होने के कारण कांग्रेस समर्थित राहुल धीमान प्रधान पद की दौड़ में सबसे मजबूत स्थिति में माने जा रहे हैं।

क्या रघुवीर सिंह बाली भी विरासत संभालने में पड़ रहे कमजोर?

नगरोटा बगवां के नतीजों के बाद अब सवाल कांग्रेस विधायक रघुवीर सिंह बाली को लेकर भी उठने लगे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जिस विधानसभा क्षेत्र में कभी जीएस बाली का दबदबा निर्विवाद माना जाता था, वहां भाजपा की बढ़त कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या नई पीढ़ी अपने पिता की राजनीतिक विरासत को उसी मजबूती से संभाल नहीं पा रही, या फिर भाजपा ने जमीनी स्तर पर कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा दी है।

 

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2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा संकेत

हिमाचल के इन निकाय चुनावों को अब 2027 विधानसभा चुनाव का “सेमीफाइनल” भी माना जा रहा है। रामपुर और नगरोटा बगवां जैसे कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में भाजपा की बढ़त ने साफ संकेत दे दिए हैं कि आने वाले समय में मुकाबला और अधिक दिलचस्प होने वाला है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि कांग्रेस ने संगठन और जमीनी पकड़ को दोबारा मजबूत नहीं किया, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी को और बड़े झटके लग सकते हैं।

 

अब निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि विक्रमादित्य सिंह और रघुवीर सिंह बाली अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन को दोबारा किस तरह मजबूती देते हैं और 2027 के चुनाव में भाजपा को रोकने के लिए क्या नई रणनीति अपनाते हैं।

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