शिमला। हिमाचल प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। इससे पहले 2022 में विधानसभा चुनाव हुए थे और नई विधानसभा दिसंबर 2022 में गठित हुई थी। मौजूदा 14वीं हिमाचल विधानसभा का कार्यकाल 2022–2027 है। हालांकि चुनाव की सटीक तारीख अभी घोषित नहीं हुई है।
86 की उम्र विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा
हिमाचल में अगले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल धीरे-धीरे तेज होने लगी है। इसी बीच स्वास्थ्य एवं सामाजिक न्याय मंत्री कर्नल धनीराम शांडिल के एक बयान ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा बढ़ा दी है। 86 वर्ष की उम्र में भी सक्रिय राजनीति में बने रहने के संकेत देते हुए शांडिल ने कहा कि व्यक्ति को हर उम्र में काम करते रहना चाहिए।
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राजनीति में नई चर्चाओं का दौर
उनके इस बयान को आगामी विधानसभा चुनाव के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, शांडिल ने चुनाव लड़ने को लेकर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की है। ऐसे में उनके बयान के बाद हिमाचल की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
क्या बेटे का पता होगा साफ?
सोलन विधानसभा सीट से अगला चुनाव वह खुद लड़ेंगे या उनके बेटे को मौका मिलेगा। इस पर शांडिल ने कहा कि चुनाव लड़ाने का फैसला पार्टी आलाकमान करेगा। यानी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर उन्होंने फिलहाल कोई अंतिम घोषणा नहीं की है। उनके बयान के बाद यह सवाल जरूर उठने लगा है कि 86 साल की उम्र में भी क्या शांडिल चुनावी राजनीति में सक्रिय रहेंगे।
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बेटे की राजनीति में एंट्री करवाना चाहते थे शांडिल
साल 2025 में डॉ. धनीराम शांडिल से जब उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने को लेकर सवाल पूछा गया थ तो तब उनके बयान से संकेत मिला था कि वह अपने बेटे कर्नल संजय शांडिल को राजनीति में लाने की इच्छा रखते हैं। इसी के बाद हिमाचल की सियासत में यह चर्चा तेज हुई कि 86 वर्षीय शांडिल आने वाले समय में अपनी सोलन की राजनीतिक विरासत बेटे को सौंप सकते हैं।
बयान पर शांडिल का यू-टर्न
बाद में, जब उनसे इस बयान पर दोबारा सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि किसे चुनाव लड़ाना है- तो इस पर यू-टर्न लेते हुए कहा था कि टिकट किसे देना है, इसका फैसला कांग्रेस हाईकमान करेगा।
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क्या राजनीति में सक्रिय हैं कर्नल संजय शांडिल?
कर्नल संजय शांडिल, धनीराम शांडिल के बेटे हैं और सेना से सेवानिवृत्त कर्नल हैं। 2026 में कांग्रेस ने उन्हें प्रदेश कांग्रेस के पूर्व सैनिक विभाग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया। यह उनकी राजनीति में औपचारिक संगठनात्मक भूमिका की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। यानी यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि संजय शांडिल की राजनीति में सक्रियता अब केवल पारिवारिक राजनीतिक चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें कांग्रेस संगठन में जिम्मेदारी भी मिल चुकी है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उन्हें 2027 विधानसभा चुनाव में सोलन से कांग्रेस का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया है।
पिता के बाद बेटे की दावेदारी की चर्चा क्यों?
सोलन विधानसभा सीट धनीराम शांडिल का मजबूत राजनीतिक आधार रही है। वह 2012, 2017 और 2022 में लगातार तीन बार यहां से विधायक चुने गए। 2017 और 2022 दोनों चुनावों में उनका मुकाबला अपने दामाद डॉ. राजेश कश्यप से हुआ- जो भाजपा के उम्मीदवार थे। 2017 में शांडिल महज 671 वोट से जीते थे, जबकि 2022 में जीत का अंतर बढ़कर 3,858 वोट हो गया।
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चुनाव में आमने-सामने रह चुके हैं दामाद-ससुर
शांडिल परिवार का राजनीतिक समीकरण भी सोलन की राजनीति में चर्चा का विषय रहा है। उनकी बेटी गीतांजलि कश्यप की शादी डॉ. राजेश कश्यप से हुई है। यानी 2017 और 2022 में सोलन में एक तरफ कांग्रेस से ससुर धनीराम शांडिल थे और दूसरी तरफ भाजपा से उनके दामाद राजेश कश्यप। दोनों चुनावों में शांडिल ने जीत हासिल की।
सेना से राजनीति तक का सफर
डॉ. धनीराम शांडिल का राजनीतिक सफर शुरू होने से पहले लंबा सैन्य करियर रहा है। उनका जन्म 20 अक्तूबर, 1940 को सोलन जिले के कंडाघाट तहसील के बशींल गांव में हुआ था। उन्होंने भारतीय सेना में वर्ष 1962 से 1996 तक सेवाएं दीं और कर्नल के पद से सेवानिवृत्त हुए।
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राजनीति में कब हुई एंट्री?
सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने राजनीति का रुख किया। उनका सक्रिय राजनीतिक सफर 1990 के दशक के आखिर में शुरू हुआ और 1999 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा। खास बात यह रही कि उनका पहला चुनाव कांग्रेस के टिकट पर नहीं, बल्कि हिमाचल विकास कांग्रेस (HVC) के टिकट पर था।
पहली बार लोकसभा कब पहुंचे?
1999 का चुनाव शांडिल के राजनीतिक जीवन का अहम पड़ाव रहा। उन्होंने शिमला की आरक्षित लोकसभा सीट से हिमाचल विकास कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उन्हें 1999 में 13वीं लोकसभा के लिए हिमाचल विकास कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित बताया गया है।
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उस समय हिमाचल विकास कांग्रेस प्रदेश की राजनीति में एक क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत थी। यह पार्टी पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम से जुड़ी राजनीतिक धारा से निकली थी। बाद में 2004 में हिमाचल विकास कांग्रेस का कांग्रेस में विलय हो गया।
दूसरी बार कब बने सांसद?
HVC के कांग्रेस में विलय के बाद शांडिल कांग्रेस में शामिल हो गए। 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें दोबारा शिमला लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। इस बार उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कर लगातार दूसरी बार संसद पहुंचे।
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चुनाव में किसको हराया?
2004 के चुनाव में शांडिल को 3,11,182 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के हिरानंद कश्यप को 2,03,002 वोट मिले। सांसद रहते हुए शांडिल कई संसदीय समितियों से जुड़े। उनके संसदीय कार्यकाल में रक्षा समिति, पुस्तकालय समिति, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति और विदेश मामलों से जुड़ी समितियों में उनकी भूमिका रही। बाद में वह विदेश मामलों की स्थायी समिति के सदस्य भी रहे।
कब हारे लोकसभा चुनाव?
2009 में शांडिल ने कांग्रेस के टिकट पर एक बार फिर शिमला लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार उन्हें भाजपा के वीरेंद्र कश्यप से हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में वीरेंद्र कश्यप को 3,10,946 वोट मिले, जबकि शांडिल को 2,83,619 वोट मिले।
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विधानसभा में हुई एंट्री
लोकसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने विधानसभा की राजनीति का रुख किया। वर्ष 2012 में कांग्रेस ने उन्हें सोलन विधानसभा सीट से मैदान में उतारा। यह उनका विधानसभा चुनाव में पहला बड़ा चुनावी प्रवेश था।
कब बने पहली बार विधायक?
2012 के विधानसभा चुनाव में शांडिल ने सोलन विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की। उन्हें 24,250 वोट मिले, जबकि भाजपा की कुमारी शीला को 19,778 वोट मिले। शांडिल ने 4,472 वोटों के अंतर से चुनाव जीता।
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कब बने पहली बार मंत्री?
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में शांडिल को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उन्हें सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता और सैनिक कल्याण से जुड़े विभाग दिए गए। संसद के रिकॉर्ड में भी 2012 में वीरभद्र सिंह सरकार में उनके कैबिनेट मंत्री बनने और इन विभागों की जिम्मेदारी मिलने का उल्लेख है।
कब बने दूसरी बार विधायक?
2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर शांडिल को सोलन से टिकट दिया। इस चुनाव में उनका मुकाबला भाजपा के राजेश कश्यप से हुआ। मुकाबला बेहद करीबी रहा। शांडिल को 26,200 वोट मिले, जबकि राजेश कश्यप को 25,529 वोट मिले। इस तरह शांडिल महज 671 वोटों के अंतर से चुनाव जीतकर लगातार दूसरी बार विधायक बने। यही राजेश कश्यप आगे चलकर शांडिल के प्रमुख चुनावी प्रतिद्वंद्वी बने। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी दोनों के बीच मुकाबला हुआ।
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सुरेश कश्यप से हारे शांडिल
विधानसभा सदस्य रहते हुए 2019 में कांग्रेस ने शांडिल को एक बार फिर शिमला लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। यह उनके राजनीतिक करियर की संसद में वापसी की कोशिश थी। हालांकि, इस चुनाव में भाजपा के सुरेश कुमार कश्यप ने जीत दर्ज की। सुरेश कश्यप को 6,06,183 वोट मिले, जबकि शांडिल को 2,78,668 वोट मिले। इस हार के बाद शांडिल सोलन की विधानसभा राजनीति में सक्रिय रहे।
कब बने तीसरी बार विधायक?
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर शांडिल पर भरोसा जताया। 82 वर्ष की उम्र में उन्होंने सोलन सीट से चुनाव लड़ा और भाजपा के राजेश कश्यप को हराकर तीसरी बार विधानसभा पहुंचे। 2022 के चुनाव में शांडिल को 30,089 वोट मिले, जबकि राजेश कश्यप को 26,231 वोट मिले। जीत का अंतर 3,858 वोट रहा। चुनावी हलफनामे में उस समय शांडिल की उम्र 82 वर्ष दर्ज थी।
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सुक्खू सरकार में फिर मंत्री बने
दिसंबर 2022 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में मंत्रिमंडल का गठन हुआ। 8 जनवरी 2023 को डॉ. कर्नल धनीराम शांडिल ने कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली। हिमाचल सरकार की आधिकारिक जानकारी के अनुसार वह सोलन विधानसभा क्षेत्र से मंत्री बने और उनके पास स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण से संबंधित जिम्मेदारी रही।
कब थामा था कांग्रेस का हाथ?
इस तरह शांडिल का राजनीतिक सफर लोकसभा से विधानसभा और फिर दोबारा मंत्रिमंडल तक पहुंचा। 1999 में क्षेत्रीय दल हिमाचल विकास कांग्रेस से सांसद बनने वाले शांडिल ने 2004 में कांग्रेस का दामन थामा और इसके बाद से कांग्रेस की राजनीति में लगातार सक्रिय रहे। वह कांग्रेस संगठन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। हिमाचल सरकार की आधिकारिक जीवनी के अनुसार वह मिजोरम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के लिए कांग्रेस के प्रभारी भी रहे और अप्रैल 2011 से सितंबर 2013 तक कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य रहे।
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अब 2027 को लेकर नजर
अब शांडिल 86 वर्ष के हैं और 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है। ऐसे में सोलन सीट पर कांग्रेस की ओर से अगला चेहरा कौन होगा, इस पर चर्चा स्वाभाविक है। क्या शांडिल खुद एक और चुनाव लड़ेंगे या पार्टी किसी नए चेहरे को मौका देगी- इसका फैसला अभी बाकी है।
पार्टी आलाकमान लेगी आखिरी फैसला
शांडिल ने भी चुनाव लड़ने के सवाल पर फैसला पार्टी आलाकमान पर छोड़ दिया है। फिलहाल उन्होंने राजनीति से संन्यास की कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की है। उनका कहना है कि उम्र उनके काम के आड़े नहीं आई और व्यक्ति को हर उम्र में काम करते रहना चाहिए।
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चुनाव को लेकर बना सस्पेंस
यही वजह है कि 2027 के चुनाव से पहले शांडिल की राजनीतिक भूमिका को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। करीब ढाई दशक से सक्रिय राजनीति में रहने वाले शांडिल ने सांसद, विधायक, मंत्री और संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां संभाली हैं। अब देखना होगा कि उनकी यह लंबी सियासी पारी 2027 में किस मोड़ पर पहुंचती है।
धनीराम शांडिल का राजनीतिक सफर
- तीन बार सोलन से विधायक
- दो बार लोकसभा सांसद
- दो बार हिमाचल सरकार में कैबिनेट मंत्री
