शिमला। हिमाचल प्रदेश की खराब आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने के लिए मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू सरकार द्वारा लिए गए सख्त फैसलों का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। भारी कर्ज के बोझ और सीमित संसाधनों के बीच प्रदेश की वित्तीय हालत को मजबूत बनाने के लिए सरकार ने पिछले कुछ समय में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। इन फैसलों के परिणाम अब धरातल पर नजर आने लगे हैं और सरकार के खजाने में अतिरिक्त राजस्व की आमद शुरू हो गई है।
खाली खजाने को भरने लगा सरकार का सेस मॉडल
प्रदेश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सुक्खू सरकार ने बैंकिंग, बीमा, वित्तीय और विभिन्न व्यावसायिक संस्थानों पर विशेष उपकर (सेस) लगाने का फैसला लिया था। शुरुआत में इस फैसले को लेकर खूब चर्चा हुई, लेकिन अब इससे मिलने वाली आय सरकार के लिए राहत का कारण बन रही है। बिजली खपत के आधार पर वसूले जा रहे इस सेस से करोड़ों रुपये का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो रहा है।
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बैंक और बीमा संस्थानों से करोड़ों की आय
सरकार ने बैंकों, बीमा कंपनियों और अन्य वित्तीय संस्थानों पर प्रति यूनिट बिजली खपत के हिसाब से दो रुपये पर्यावरण सेस लागू किया है। यह व्यवस्था जनवरी 2026 से प्रभावी की गई थी। इसके तहत प्रदेशभर के हजारों संस्थानों से लगातार राजस्व प्राप्त हो रहा है।
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बिजली बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार जनवरी से जून 2026 तक बैंकिंग, बीमा और वित्तीय क्षेत्र से जुड़े 15 हजार से अधिक उपभोक्ताओं पर कुल करीब 1.73 करोड़ रुपये का उपकर आंका गया है। हर महीने इस राशि में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे स्पष्ट है कि सरकार की नई राजस्व नीति असर दिखा रही है।
व्यवसायिक संस्थानों को दायरे में लाने से बढ़ी आमदनी
सरकार ने केवल वित्तीय संस्थानों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा बल्कि विभिन्न व्यावसायिक श्रेणियों के बिजली उपभोक्ताओं को भी उपकर के दायरे में शामिल किया। जून 2026 से लागू इस व्यवस्था के तहत प्रति यूनिट बिजली खपत पर एक रुपये का सेस लगाया गया। इस फैसले के बाद पहली ही बार में 15 हजार से अधिक व्यवसायिक उपभोक्ताओं से लगभग 1.85 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व आंका गया। इससे सरकार को उम्मीद से बेहतर परिणाम मिले हैं।
छह महीने में सरकारी तिजोरी में आए ₹3.58 करोड़ से अधिक
बिजली बोर्ड द्वारा जारी आंकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि सीएम सुक्खू का यह सेस मॉडल खाली खजाने के लिए बूस्टर डोज साबित हो रहा है। जनवरी से जून 2026 के बीच दोनों श्रेणियों को मिलाकर कुल ₹3,58,04,452 (3.58 करोड़ रुपए से अधिक) का उपकर आंका जा चुका है। अधिकारियों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है, क्योंकि अब बड़ी संख्या में व्यवसायिक उपभोक्ता भी इस व्यवस्था के अंतर्गत आ चुके हैं।
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कर्ज के बोझ से उबारने की दिशा में बड़ा कदम
हिमाचल प्रदेश लंबे समय से वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, विकास कार्यों और कर्ज की अदायगी जैसी चुनौतियों के बीच सरकार को अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत महसूस हो रही थी। इसी को ध्यान में रखते हुए सुक्खू सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए, जिन्हें आर्थिक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजस्व बढ़ाने के ऐसे प्रयास लगातार जारी रहे तो प्रदेश की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिल सकती है और सरकार विकास परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने में सफल हो सकती है।
आत्मनिर्भर हिमाचल की दिशा में बढ़ते कदम
राज्य सरकार का दावा है कि प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लक्ष्य के तहत राजस्व बढ़ाने के लिए कई नई नीतियां लागू की जा रही हैं। बैंकिंग, बीमा, वित्तीय और व्यावसायिक संस्थानों पर लगाया गया सेस भी इसी रणनीति का हिस्सा है। सरकार को उम्मीद है कि इससे मिलने वाली अतिरिक्त आय भविष्य में प्रदेश की आर्थिक मजबूती का आधार बनेगी।
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आने वाले समय में और बढ़ सकता है राजस्व
विभागीय अधिकारियों का मानना है कि जैसे-जैसे सेस व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी होगी और अधिक उपभोक्ता इसके दायरे में आएंगे, वैसे-वैसे सरकार की आय में और बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है। इससे प्रदेश के खाली खजाने को भरने और आर्थिक चुनौतियों से निपटने में सहायता मिलने की संभावना जताई जा रही है।
