शिमला। देवभूमि हिम,अचल प्रदेश की राजधानी शिमला के संजौली क्षेत्र में स्थित विवादित मस्जिद मामले में आज गुरुवार को जिला अदालत ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने शिमला नगर निगम आयुक्त कोर्ट के उस पुराने आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें मस्जिद की निचली दो मंजिलों को अवैध निर्माण मानते हुए तोड़ने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने एमसी के आदेश को माना सही
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस आदेश के साथ ही वक्फ बोर्ड को एक बार फिर झटका लगा है, जिसने इस मामले में नगर निगम के फैसले को अदालत में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई जिला अदालत में हुई, जहां दोनों पक्षों वक्फ बोर्ड और नगर निगम के अधिवक्ताओं ने अपनी दलीलें पेश कीं।
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न्यायालय ने सभी तथ्यों की समीक्षा करने के बाद नगर निगम आयुक्त के 3 मई 2024 के आदेश को वैध माना और उसे बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि मस्जिद का निचला निर्माण नियमों के अनुरूप नहीं पाया गया और यह स्पष्ट रूप से गैरकानूनी निर्माण की श्रेणी में आता है।
यह था विवाद
संजौली में स्थित यह मस्जिद लंबे समय से विवादों में थी। नगर निगम शिमला ने आरोप लगाया था कि मस्जिद की दो मंजिलें बिना स्वीकृति और भवन निर्माण नियमों का उल्लंघन करते हुए बनाई गई हैं। इस पर आयुक्त कोर्ट ने 3 मई को आदेश जारी कर मस्जिद की निचली दो मंजिलें गिराने को कहा था। इसके खिलाफ वक्फ बोर्ड ने 17 मई को अदालत में अपील दायर की थी। तब से यह मामला लगातार सुनवाई में बना रहा।
कानूनी प्रक्रिया की पूरी समयरेखा
- 6 अक्टूबर को अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश यजुवेंद्र सिंह ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला 30 अक्टूबर के लिए सुरक्षित रखा था।
- इससे पहले 19 मई को अदालत ने मस्जिद कमेटी के प्रधान और एमसी शिमला को नोटिस जारी कर रिकार्ड तलब किया था।
- 26 मई को मस्जिद तोड़ने पर अदालत ने अंतरिम रोक (स्टे) लगाई थी।
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- यह रोक बाद में कई बार बढ़ाई गई और मामला 5 जुलाई, फिर 11 जुलाई और 6 सितंबर तक बहस योग्य बना रहा।
- 6 सितंबर को करीब ढाई घंटे तक दोनों पक्षों की विस्तृत बहस हुई।
- अंततः 30 अक्टूबर 2025 को अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए नगर निगम के आदेश को सही ठहराया।
हाई कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प
अब नगर निगम को आदेश के अनुरूप कार्रवाई करनी होगी। वहीं, वक्फ बोर्ड के पास इस निर्णय को हाई कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प बचा है। मामले ने एक बार फिर शिमला की स्थानीय राजनीति और धार्मिक संस्थानों के निर्माण नियमों पर बहस छेड़ दी है।
