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April 15, 2026
हिमाचल : पंचायत चुनाव में खर्च पर कोई लगाम नहीं, प्रधान-BDC उम्मीदवारों को खुली छूट
31 मई से पहले होंगे हिमाचल में पंचायत चुनाव
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में होने वाले आगामी पंचायत चुनाव एक बार फिर उसी पुराने ढर्रे पर होते नजर आ रहे हैं। जहां पंचायत प्रधान और पंचायत समिति सदस्य BDC के चुनावी खर्च पर कोई स्पष्ट सीमा तय नहीं की गई है।
राज्य चुनाव आयोग ने इस बार इन पदों के लिए भी खर्च की अधिकतम सीमा निर्धारित करने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा था- ताकि चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और संतुलित बनाया जा सके।
सरकार की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया है। जिसके चलते अब इन पदों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपने खर्च का कोई आधिकारिक हिसाब-किताब देने की बाध्यता नहीं होगा।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में पंचायत स्तर के चुनावों में भी धनबल का प्रभाव लगातार बढ़ता देखा गया है। कई मामलों में प्रधान पद के उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए बड़ी रकम खर्च करते हैं।
चाहे वह प्रचार सामग्री हो, जनसंपर्क अभियान हो या फिर समर्थकों के लिए व्यवस्थाएं। ऐसे में खर्च सीमा तय न होना चुनावी समानता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
वहीं, दूसरी ओर, जिला परिषद और नगर निकायों में पार्षद पद के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर पहले से ही खर्च की सीमा लागू है। इन उम्मीदवारों को चुनाव के दौरान किए गए हर खर्च का पूरा रिकॉर्ड रखना होता है। चुनाव समाप्त होने के एक महीने के अंदर यह विवरण राज्य चुनाव आयोग को सौंपना अनिवार्य होता है।
नियमों के मुताबिक, अगर कोई उम्मीदवार तय समय में खर्च का ब्यौरा नहीं देता या गलत जानकारी प्रस्तुत करता है- तो उसे एक निश्चित अवधि के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इतना ही नहीं, अगर कोई उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद भी खर्च का विवरण देने में विफल रहता है, तो उसकी सदस्यता तक पर खतरा मंडरा सकता है।
चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए रखने के लिए जिला निर्वाचन अधिकारियों की ओर से विशेष निगरानी व्यवस्था भी की जाती है। इसके तहत फ्लाइंग स्क्वॉड और निगरानी टीमें गठित की जाती हैं, जो चुनाव के दौरान उम्मीदवारों पर नजर रखती हैं। ये टीमें उम्मीदवारों के बैंक खातों, खर्च से जुड़ी रसीदों, प्रचार सामग्री और अन्य आर्थिक गतिविधियों की जांच करती हैं।
जिला परिषद और पार्षद पद के उम्मीदवारों के लिए हर छोटे-बड़े खर्च का हिसाब रखना जरूरी होता है। इसमें पोस्टर-बैनर, वाहन उपयोग, जनसभाएं, प्रचार अभियान, समर्थकों के खान-पान और अन्य सभी गतिविधियों पर हुए खर्च को रजिस्टर में दर्ज करना पड़ता है। चुनाव आयोग द्वारा मांगने पर यह पूरा रिकॉर्ड प्रस्तुत करना होता है, जिससे चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।
प्रदेश में इस बार चुनावी गतिविधियां काफी व्यापक स्तर पर होने जा रही हैं। करीब 3757 पंचायतों और 73 नगर निकायों में चुनाव प्रस्तावित हैं- जिनमें 65 हजार से अधिक उम्मीदवार मैदान में उतर सकते हैं। ऐसे बड़े चुनावी परिदृश्य में जहां एक ओर कुछ पदों पर खर्च की सख्त निगरानी है। वहीं दूसरी ओर पंचायत स्तर के अहम पदों पर खर्च की कोई सीमा न होना व्यवस्था में असंतुलन को दर्शाता है।
अब सभी की नजरें चुनाव तारीखों के ऐलान पर टिकी हैं, जो 20 अप्रैल के बाद कभी भी हो सकता है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को 31 मई से पहले इन चुनावों को संपन्न कराने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में हिमाचल प्रदेश का चुनावी माहौल और अधिक गर्म होने की पूरी संभावना है।