रामपुर बुशहर (शिमला)। हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के रामपुर से एक ऐसा न्यायिक मामला सामने आया है, जिसने अदालत में गवाही और ठोस साक्ष्यों की अहमियत को फिर सामने ला दिया है। करीब चार साल पुराने एनडीपीएस एक्ट के मामले में पुलिस ने जिस आरोपी को 6 किलो से अधिक चरस के साथ पकड़े जाने का दावा किया था, उसे अदालत ने आखिरकार बरी कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के दोनों स्वतंत्र गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से मुकर गए। इसके बाद बरामदगी की कार्रवाई और पुलिस की कहानी को साबित करना अभियोजन के लिए मुश्किल हो गया।

6 किलो 24 ग्राम चरस बरामद करने का था दावा

मामला 2 मई 2022 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार पुलिस ने कुटवा नामक स्थान पर कार्रवाई करते हुए राजकुमार पुत्र भाग दास, निवासी गांव कुटवा, डाकघर जाओं, तहसील आनी, जिला कुल्लू को पकड़ा था। पुलिस का दावा था कि आरोपी के कब्जे से 6 किलो 24 ग्राम चरस बरामद की गई थी। पुलिस के मुताबिक बरामदगी की पूरी कार्रवाई स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में की गई थी। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी।

 

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अदालत पहुंचते ही बदल गया गवाहों का रुख

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के लिए सबसे बड़ी मुश्किल उस समय खड़ी हुई, जब दोनों स्वतंत्र गवाह अदालत में अपने पूर्व बयानों पर कायम नहीं रहे। दोनों गवाह अभियोजन की कहानी के समर्थन में नहीं आए और अपने पहले के बयानों से मुकर गए। स्वतंत्र गवाहों के बयान बदलने से कथित बरामदगी की प्रक्रिया को लेकर अभियोजन का पक्ष कमजोर पड़ गया। जिस कार्रवाई को पुलिस ने गवाहों की मौजूदगी में किए जाने का दावा किया था, उसे अदालत के समक्ष उसी मजबूती से साबित करना संभव नहीं हो सका।

 

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पुलिस की गवाही पर भी अदालत ने जताया संदेह

अदालत ने मामले में पेश किए गए दस्तावेजों, उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का बारीकी से अवलोकन किया। सुनवाई के दौरान पुलिस की गवाही पर भी संदेह व्यक्त किया गया। अभियोजन पक्ष ऐसा पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर पाया, जिसके आधार पर आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित किया जा सके। न्यायालय में आपराधिक मामलों में आरोपों को केवल संदेह या दावे के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए साबित करना जरूरी होता है। इस मामले में अभियोजन पक्ष उस कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया।

 

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करीब चार साल जेल में रहा आरोपी

मामले का एक अहम पहलू यह भी है कि आरोपी राजकुमार करीब चार वर्षों से जेल में था। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अब अदालत के फैसले से उसे बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसे दोषी ठहराने के बजाय सबूतों के अभाव में बरी करने का फैसला सुनाया। यह फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि गंभीर आरोप होने के बावजूद अदालत में दोष साबित करने के लिए अभियोजन के पास मजबूत, सुसंगत और भरोसेमंद साक्ष्य होना आवश्यक है।

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गवाहों के मुकरने से कमजोर हुई अभियोजन की कहानी

इस मामले में स्वतंत्र गवाहों का अदालत में अपने पूर्व बयानों से पलट जाना अभियोजन के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। बरामदगी की कार्रवाई में स्वतंत्र गवाहों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही थी, लेकिन जब वही गवाह अभियोजन के पक्ष में नहीं आए तो पुलिस की कार्रवाई को उसी आधार पर मजबूती देना मुश्किल हो गया। अदालत ने पूरे मामले का मूल्यांकन उपलब्ध रिकॉर्ड और साक्ष्यों के आधार पर किया और पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।

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न्यायालय ने साक्ष्यों के आधार पर सुनाया फैसला

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय किन्नौर स्थित रामपुर ने इसी आधार पर राजकुमार को बरी करने का फैसला सुनाया। यह फैसला आरोप की गंभीरता के बजाय मामले में उपलब्ध और अदालत के समक्ष साबित किए जा सकने वाले साक्ष्यों पर आधारित रहा।

 

मामले की जानकारी उप जिला न्यायवादी कमल चन्देल ने 15 सितंबर को जारी प्रेस नोट के माध्यम से दी। चार साल पुराने इस मामले में अदालत के फैसले के बाद आरोपी को राहत मिली है, जबकि यह मामला एक बार फिर यह सवाल सामने लाता है कि किसी भी आपराधिक मामले में मजबूत जांच के साथ-साथ अदालत में विश्वसनीय साक्ष्यों और गवाहों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है।

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