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September 14, 2026

गजब! नगर निगम ने वन भूमि पर बना दिया अपना कार्यालय, हिमाचल हाईकोर्ट ने खुद तोड़ने के दिए निर्देश

संजौली के पास बंगला कॉलोनी में अवैध निर्माण पर हाईकोर्ट के सख्त निर्देश

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MC Shimla highcourt

शिमला। हिमाचल प्रदेश में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे और निर्माण को लेकर अब सवाल सिर्फ आम लोगों पर नहीं उठ रहे, बल्कि सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली भी हाईकोर्ट के निशाने पर आ गई है। राजधानी शिमला के संजौली की बंगला कॉलोनी में ऐसा ही मामला सामने आया है, जहां नगर निगम शिमला ने कथित तौर पर वन भूमि पर अपना वार्ड कार्यालय बना दिया। मामले पर हिमाचल हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए नगर निगम को अपना ही अवैध कार्यालय खुद ध्वस्त करने के आदेश दिए हैं।

 

अदालत ने कहा कि जिस संस्था की जिम्मेदारी शहर में अवैध निर्माण पर कार्रवाई करने की है, अगर वही नियमों को ताक पर रखकर निर्माण करे तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने निगम को निर्माण हटाने के साथ जमीन को उसकी मूल स्थिति में बहाल करने के निर्देश भी दिए हैं।

वन भूमि पर 23, निगम की जमीन पर 10 अवैध निर्माण

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। अदालत के निर्देश पर कराए गए निरीक्षण में बंगला कॉलोनी क्षेत्र में वन भूमि पर 23 और नगर निगम की भूमि पर 10 अवैध ढांचे पाए गए।

 

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वन भूमि पर बने 23 ढांचों का कुल क्षेत्रफल करीब 822.52 वर्ग मीटर बताया गया है। हाईकोर्ट ने इन मामलों में चल रही कार्रवाई में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। वहीं निगम की जमीन पर बने 10 अवैध ढांचों के खिलाफ भी तत्काल नियमानुसार बेदखली प्रक्रिया शुरू करने को कहा गया है। जिस जमीन पर बना कार्यालय, वह पहले ही वन विभाग की हो चुकी थी

 

मामले में सामने आया कि नगर निगम का वार्ड कार्यालय खसरा नंबर 464 पर बनाया गया है। खास बात यह है कि इस निर्माण के लिए भवन का नक्शा भी पास नहीं कराया गया था। वर्ष 2013 की अधिसूचना के तहत संबंधित भूमि का स्वामित्व वन विभाग को स्थानांतरित किया जा चुका था।

 

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इसके बावजूद यहां सार्वजनिक धन खर्च कर कार्यालय के साथ सामुदायिक केंद्र और रीडिंग रूम जैसी सुविधाओं का निर्माण कराया गया। वार्ड कार्यालय का उद्घाटन 17 अक्टूबर 2015 को किया गया था। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद यही निर्माण नगर निगम को अपने स्तर पर हटाना होगा।

‘रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो...’

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकारी तंत्र की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी की। पीठ ने सवाल उठाया कि जब नियमों को लागू कराने वाली संस्था ही अनधिकृत निर्माण करने लगे तो उसकी निगरानी कौन करेगा?

 

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अदालत ने निगम की उस दलील को स्वीकार नहीं किया, जिसमें इस तरह की अनियमितता को नजरअंदाज करने या बाद में नियमित करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियमों के उल्लंघन को केवल इसलिए अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि निर्माण सरकारी संस्था ने किया है।

अधिकारियों की भी तय होगी जिम्मेदारी

हाईकोर्ट ने सिर्फ अवैध निर्माण हटाने तक मामला सीमित नहीं रखा है। अदालत ने उन अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश भी दिए हैं, जिनकी निगरानी में बिना स्वीकृत नक्शे और वन भूमि पर सार्वजनिक धन से निर्माण हुआ। अदालत ने संबंधित विभागों को अपने आदेशों की अनुपालना रिपोर्ट भी प्रस्तुत करने को कहा है।

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वन भूमि का रिकॉर्ड भी दुरुस्त करने के आदेश

हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर 2013 की अधिसूचना के आधार पर खसरा नंबर 443, 444 और 1662 की वन भूमि का इंतकाल वन विभाग के नाम दर्ज करने के निर्देश दिए हैं, ताकि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि की स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज हो सके।

शिकायत से खुला पूरा मामला

यह मामला उस समय सामने आया जब बंगला कॉलोनी क्षेत्र में वन भूमि पर अतिक्रमण, पक्के फर्श बनाने, देवदार के पेड़ों को नुकसान पहुंचाने और कचरा फेंकने या जलाने को लेकर अदालत को शिकायत मिली। हाईकोर्ट ने मामले की जमीनी स्थिति जानने के लिए जिला कानूनी सेवाएं प्राधिकरण शिमला के सचिव और एसडीएम शिमला को निरीक्षण के निर्देश दिए। दोनों की रिपोर्ट सामने आने के बाद 23 निर्माण वन भूमि और 10 निर्माण नगर निगम की भूमि पर अवैध पाए गए।

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अब इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि जिस नगर निगम की जिम्मेदारी शहर में अवैध निर्माण पर लगाम लगाने की है, उसी को अपना ही निर्माण गिराना पड़ेगा। हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की है।

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