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September 14, 2026
हिमाचल : दूसरे आदमी के साथ रह रही पत्नी, पति के हक में कोर्ट का फैसला- नहीं देना पड़ेगा खर्चा
अदालत ने बच्चे के अधिकार को रखा अलग- पति को उसके लिए देने होंगे पैसे
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शिमला। हिमाचल प्रदेश के रामपुर स्थित फैमिली कोर्ट किन्नौर ने पति-पत्नी के बीच विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पत्नी की ओर से अपने लिए मांगे गए गुजारा भत्ता को मंजूर नहीं किया।
वहीं, नाबालिग बेटे के भरण-पोषण को अलग मानते हुए उसके लिए पति को हर महीने 5 हजार रुपये देने का आदेश दिया है। यह भुगतान बेटे के बालिग होने तक जारी रहेगा। मामले में पत्नी ने अपने और नाबालिग बेटे के लिए पति से कुल 25 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता मांगा था।
पत्नी का आरोप था कि पति ने उसके साथ प्रताड़ना की और 1 अगस्त 2022 को उसे घर से निकाल दिया। उसने अदालत के समक्ष पति की आर्थिक स्थिति का भी हवाला दिया। पत्नी के अनुसार, उसका पति सरकारी कर्मचारी है और करीब 90 हजार रुपये प्रतिमाह कमाता है। इसके अलावा उसे अपनी संपत्ति से लगभग 5 लाख रुपये सालाना आय भी होती है।
पत्नी के आरोपों के जवाब में पति ने सभी आरोपों से इनकार किया। पति ने अदालत के सामने पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ कथित अवैध संबंध होने की बात कही। उसका दावा था कि उसने पत्नी को उक्त व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखा था।
मामले में पति ने नाबालिग बच्चे को लेकर भी सवाल उठाया। उसने दावा किया कि बच्चा उसका नहीं है और इसलिए उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी उस पर नहीं बनती। हालांकि अदालत ने पति की इस दलील को स्वीकार नहीं किया और बच्चे को उसका नाबालिग बेटा माना।
अदालत ने बच्चे के संबंध में उपलब्ध तथ्यों पर भी विचार किया। न्यायालय ने पाया कि बच्चे का जन्म उस समय हुआ था, जब पति-पत्नी का विवाह कायम था। पत्नी के घर छोड़ने के करीब नौ महीने के भीतर उसने बेटे को जन्म दिया था।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने नाबालिग बच्चे को पति का बेटा माना। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पिता से अलग नहीं की जा सकती। इसी आधार पर पति को बेटे के लिए 5 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया गया।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पत्नी की ओर से संबंधित व्यक्ति के खिलाफ दर्ज कराई गई दुष्कर्म की प्राथमिकी का भी उल्लेख हुआ। अदालत ने पाया कि पत्नी ने उक्त व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज कराया था, लेकिन जांच के दौरान बाद में उसने अपने बयान वापस ले लिए थे।
इसके बाद पुलिस की ओर से मामले को समाप्त करने के लिए रद्द करने की रिपोर्ट दाखिल की गई थी। अदालत ने इस पूरे घटनाक्रम को मामले के अन्य तथ्यों के साथ जोड़कर देखा।
अदालत ने मामले की परिस्थितियों और रिकॉर्ड में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि पत्नी यह साबित नहीं कर सकी कि उसे पति की ओर से प्रताड़ित किया गया था। न्यायालय ने इसके विपरीत माना कि पत्नी के आचरण से पति के प्रति क्रूरता हुई।
इसी निष्कर्ष के आधार पर फैमिली कोर्ट ने पत्नी को अपने लिए गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया। यानी पत्नी की ओर से मांगे गए 25 हजार रुपये प्रतिमाह के भरण-पोषण की मांग स्वीकार नहीं की गई।
हालांकि, अदालत ने नाबालिग बेटे के अधिकार को अलग माना। बच्चे के भरण-पोषण के लिए पति को हर महीने 5 हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया है। यह राशि बेटे के बालिग होने तक जारी रखनी होगी।
इस फैसले में अदालत ने पत्नी के दावे और बच्चे के भरण-पोषण को अलग-अलग आधार पर देखा। पत्नी को स्वयं के लिए गुजारा भत्ता नहीं मिला। मगर नाबालिग बेटे के लिए आर्थिक सहायता का आदेश दिया गया।
अदालत के अनुसार, बच्चे का जन्म विवाह के दौरान हुआ था और उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर उसे पति का बेटा माना गया। इस तरह मामले में पत्नी की व्यक्तिगत गुजारा भत्ता की मांग खारिज हो गई। जबकि नाबालिग बेटे के लिए 5 हजार रुपये प्रतिमाह का भरण-पोषण तय किया गया है।