शिमला। चिट्टे की तस्करी करने वाले पहले खुद नशे के आदी होते हैं। लेकिन 4 से 6 हजार रुपए प्रति ग्राम कीमत में बिकने वाले इस खतरनाक नशे का जब वे खर्च नहीं उठा पाते तो वे तस्करी के रास्ते पर उतर आते हैं। शिमला पुलिस ऑपरेशन क्लीन के तहत हर रोज चिट्टे के चार से पांच मामले दर्ज कर रही है। इन मामलों में एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्रवाई की जाती है और आरोपी को लॉकअप में बंद कर दिया जाता है।
यहां शुरू होता है पुलिस का सिरदर्द
लॉकअप में बंद चिट्टे के आदी बिना नशे के रह नहीं सकते। उन्हें नींद नहीं आती। विड्रॉल सिम्टम के कारण उनका बर्ताव असामान्य हो जाता है। वे चिल्लाते हैं, रोते हैं और नशा उपलब्ध कराने के लिए गिड़गिड़ाते हैं। पुलिस थाने के लॉकअप में इस तरह के असामान्य व्यवहार से पुलिसकर्मियों को अपना रोजाने का काम करने में काफी दिक्कतें पेश आती हैं। ऐसे में मानवीयता के नाते उन्हें उन दवाओं की जरूरत पड़ती है, जो ऐसे नशेबाजों को शांत कर दें।
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अस्पताल ले जाना पड़ता है
पुलिस सूत्रों का कहना है कि कई बार चिट्टे के आदी युवाओं की हरकतें ज्यादा असामान्य होने पर उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ता है, ताकि वे खुद को कोई नुकसान न पहुंचा दें। शिमला पुलिस फिलहाल लॉकअप में बंद ऐसे 25 युवाओं का IGMC में इलाज करवा रही है। इसके अलावा 15 ऐसे नशेड़ियों का भी इलाज हो रहा है, जिन्हें जेल भेजा गया है। कुछ अन्य रिपन अस्पताल में भी इलाज हो रहा है।
सबसे बड़ी दिक्कत बजट की
पुलिस सूत्रों के अनुसार, चिट्टे के आदी नशेबाजों को शांत करने के लिए दवाएं जुटाना, उनकी काउंसिलिंग और विड्रॉल सिम्पटम के दौरान उनका अस्पताल में इलाज करवाने के लिए पुलिस और जेल विभाग को सरकार से अलग बजट पास करवाना पड़ता है। हिमाचल प्रदेश में जिस तेजी से चिट्टे के मामले हर रोज सामने आ रहे हैं, उन्हें देखकर लगता है कि सरकार को जल्दी ही नशेड़ियों के इलाज और पुर्नस्थापन के लिए बजट में बड़ी रकम मंजूर करनी होगी। अभी बजट पास करवाने के लिए कभी 15 दिन तो कभी एक माह तक का समय लग जाता है।
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नए बिल पर है नजर
आगामी 10 मार्च से शुरू होने वाले हिमाचल प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में प्रस्तावित नशा निरोधक बिल पर अब सभी की नजरें अटकी हैं। बीते साल पुलिस और एजेंसियों ने राज्यभर में 2515 नशा तस्करों और नशेड़ियों को पकड़ा है। वहीं, 2025 में अभी तक जितनी बड़ी संख्या में नशे के आदी पकड़े गए हैं, उसे देखकर जरूरत इस बात की महसूस हो रही है कि लॉकअप और जेलों में बंद इन नशेड़ियों को समाज की मुख्य धारा में लाना पुलिस और अन्य एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती होगी।
