शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से एक बेहद हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। चौपाल का रहने वाला रमेश कुमार आज एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा है- जो किसी बीमारी या हादसे से भी ज्यादा खतरनाक है।

'मैं जिंदा हूं साहब'

रमेश लड़ है कि अपने जिंदा होने को साबित करने की लड़ाई। “मैं जिंदा हूं साहब, बस चल नहीं सकत” ये शब्द सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि एक टूटे हुए सिस्टम के खिलाफ चीख हैं।

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2018 में हुआ हादसा

एक ऐसा व्यक्ति, जिसे 2018 में मौत के मुंह से खींचकर नई जिंदगी दी गई थी, उसे अब सरकारी रिकॉर्ड में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया है। यह सिर्फ एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि एक इंसान के अस्तित्व को मिटा देने जैसा मामला बन गया है।

 

 

सहारा योजना बनी बेसहारा

गंभीर बीमारियों और दिव्यांगों के लिए चलाई जा रही ‘सहारा योजना’ रमेश कुमार के लिए जीवनरेखा थी। 80 प्रतिशत दिव्यांग रमेश को हर महीने 3000 रुपये की पेंशन मिलती थी, जिससे उनकी दवाइयों का खर्च निकलता था।

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कागजों से हटाया नाम

पिछले 9 महीनों से यह पेंशन बंद है। वजह है सरकारी पोर्टल पर उनका स्टेटस मृत दिखाया जा रहा है। रमेश कहते हैं किसरकार ने मुझे कागजों में मार दिया है। दो बार जिंदा होने का प्रमाण दे चुका हूँ, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही।

 

 

जब मौत सामने खड़ी थी..

रमेश की कहानी का सबसे बड़ा मोड़ साल 2018 में आया। शिमला से चंडीगढ़ जाते समय कंडाघाट के पास उनकी गाड़ी गहरी खाई में जा गिरी। हादसा इतना भयानक था कि अस्पताल पहुंचने पर उन्हें मृत मान लिया गया। मगर डॉक्टरों की कोशिशों ने हार नहीं मानी।

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व्हीलचेयर का सहारा

एक जटिल ऑपरेशन के बाद उनकी सांसें वापस आईं। हालांकि, इस जंग की कीमत बहुत भारी थी- रीढ़ की हड्डी टूटने के कारण रमेश हमेशा के लिए पैरालाइज हो गए। पिछले 8-9 सालों से वह व्हीलचेयर और बिस्तर तक सीमित हैं। कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह काम करना बंद कर चुका है।

टूटा परिवार, बिखरती जिंदगी

हादसे से पहले रमेश एक छोटी कैंटीन चलाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। चार बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। मगर हादसे के बाद सब कुछ बदल गया।

 

 

इलाज के लिए 17-18 लाख रुपये का कर्ज लेना पड़ा, जिसकी किस्तें अब चुकाना संभव नहीं। आज हालत ये है कि उनके बच्चे दिहाड़ी मजदूरी करके घर चला रहे हैं। इसके अलावा-

  • कमाई का जरिया खत्म
  • बच्चों की पढ़ाई छूट गई
  • पत्नी साथ छोड़कर चली गई
  • घर की जमा पूंजी इलाज में खत्म

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बुजुर्ग माता-पिता कर रहे देखभाल

70 साल के बुजुर्ग माता-पिता ही रमेश की देखभाल कर रहे हैं। पिता कुंभ दास कहते हैं मैं खुद बूढ़ा हूं, लेकिन बेटे को संभाल रहा हूं। अब उसकी हालत और बिगड़ गई है। लीवर और किडनी भी खराब हो रही हैं। पेंशन बंद होने से मुश्किलें और बढ़ गई हैं। रमेश खुद बिस्तर पर करवट तक नहीं बदल सकते। लगातार लेटे रहने से उनके शरीर पर गहरे घाव हो चुके हैं।


इलाज भी मुश्किल, किराया भी बकाया

रमेश को इलाज के लिए शिमला और चंडीगढ़ जाना पड़ता है, लेकिन चौपाल से सफर करना आसान नहीं। इसलिए वह शिमला में किराए के कमरे में रह रहे हैं।

अब हालात ये हैं कि 30 हजार रुपये तक किराया बकाया है। दवाइयों के पैसे तक नहीं बचे हैं।

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एक नहीं, कई ‘जिंदा मृत

मामले की जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। मेडिकल अधिकारी डॉ. शेर सिंह के अनुसार, रमेश अकेले नहीं हैं—ऐसे कई लोग हैं जिन्हें पोर्टल पर गलत तरीके से मृत दिखाया गया है।

गलती नहीं सुधार सकते...

सबसे बड़ी समस्या यह है कि स्थानीय अधिकारी इस गलती को सुधार नहीं सकते। पोर्टल को अपडेट करने की शक्ति सिर्फ उच्च स्तर मुख्यमंत्री कार्यालय या राज्य स्तर पर है। यानी एक गलती सुधारने के लिए पीड़ित को सिस्टम के ऊपरी दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं।

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सुख की सरकार पर सवाल

सरकार जहां खुद को ‘सुख की सरकार’ बताती है, वहीं चौपाल का एक दिव्यांग व्यक्ति अपनी पेंशन के लिए दर-दर भटक रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि-

  • बिना भौतिक सत्यापन के किसी को मृत कैसे घोषित किया गया?
  • 9 महीने तक पेंशन बंद रखने की जिम्मेदारी किसकी?
  • क्या सिस्टम की गलती का बोझ हमेशा आम आदमी ही उठाएगा?

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**न्याय की मांग**

रमेश कुमार की मांग साफ है कि उनकी पेंशन तुरंत बहाल की जाए। रुकी हुई राशि ब्याज सहित दी जाए। साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।रमेश की कहानी अकेली नहीं है। यह उन तमाम लोगों की आवाज है, जो सिस्टम की गलती से ‘जिंदा होकर भी मृत’ बना दिए गए हैं।

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