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April 7, 2026
हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार को लगाया 10 लाख का जुर्माना, अदालती ढांचे में लापरवाही पर लगाई फटकार
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, 20 साल पुरानी व्यवस्था से नहीं चल सकती न्यायिक व्यवस्था
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में न्यायिक व्यवस्थाओं को लेकर एक बार फिर सुक्खू सरकार को हाईकोर्ट की कड़ी नाराज़गी का सामना करना पड़ा है। प्रदेश हाईकोर्ट ने अदालतों के बुनियादी ढांचे में सुधार संबंधी अपने निर्देशों को लगातार नजरअंदाज करने पर राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये की भारी-भरकम कॉस्ट (जुर्माना) लगाई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि सरकार का रवैया टालमटोल वाला रहा है और विभागों के बीच जिम्मेदारी डालकर मामले को लटकाया जाता रहा।
दरअसल, यह मामला प्रदेश की अदालतों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और बढ़ते लंबित मामलों को लेकर दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। चीफ जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान सरकार के रवैये पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि कई बार निर्देश दिए जाने के बावजूद कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।
हाईकोर्ट ने वित्त विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिए हैं कि वे न्यायपालिका के लिए निर्धारित बजट का पूरा ब्यौरा पेश करें। अदालत ने पूछा है कि पिछले वित्त वर्ष में न्यायिक ढांचे के लिए कितना बजट आवंटित किया गया, चालू वर्ष में कितना प्रावधान रखा गया है और क्या इसमें कोई बढ़ोतरी की गई है या नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कागजी कार्यवाही से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर सुधार दिखना चाहिए।
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खंडपीठ ने सख्त लहजे में चेतावनी दी कि यदि अगली सुनवाई तक अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक अवसंरचना उपलब्ध करवाना सरकार की जिम्मेदारी है, जिससे वह पीछे नहीं हट सकती।
हाईकोर्ट ने प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे लंबित मामलों पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि मौजूदा ढांचा इन मामलों को संभालने में सक्षम नहीं है और नए न्यायालयों का गठन समय की मांग है। खासकर एनडीपीएस (नशीले पदार्थों से जुड़े) मामलों के तेजी से निपटारे के लिए विशेष अदालतों की आवश्यकता बताई गई।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि केंद्र सरकार द्वारा बार-बार एनडीपीएस मामलों के लिए विशेष न्यायालय बनाने की सलाह दी गई है, लेकिन राज्य सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की। कोर्ट ने इसे गंभीर लापरवाही करार दिया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार के ‘नशामुक्त हिमाचल’ के दावों पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि जब तक पर्याप्त न्यायिक ढांचा तैयार नहीं होगा, तब तक ऐसे दावे केवल कागजों तक ही सीमित रहेंगे।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बढ़ती आबादी और मामलों के दबाव के बावजूद सरकार आज भी दो दशक पुराने ढांचे के सहारे काम चला रही है। यह स्थिति न्याय व्यवस्था के लिए चिंताजनक है और इसे तत्काल सुधारने की जरूरत है।
गौरतलब है कि हाल के समय में हिमाचल हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार के कई फैसलों और कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणियां की हैं। ऐसे में यह ताजा फैसला एक बार फिर सरकार के लिए चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है कि न्यायिक निर्देशों की अनदेखी अब भारी पड़ सकती है। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख ने साफ संकेत दे दिए हैं कि न्यायिक ढांचे में सुधार को लेकर अब किसी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।