शाहपुर (कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद अब असली सियासी शह-मात का खेल शुरू हो चुका है। सूबे की विभिन्न नगर परिषदों और नगर पंचायतों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कुर्सियों पर काबिज होने के लिए राजनीतिक दलों ने जोड़-तोड़ और गुणा-भाग तेज कर दिया है। कई जगह तो ऐसे दिलचस्प और हैरान कर देने वाले सियासी समीकरण बन गए हैं, जिसने बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को भी चकरा दिया है।

शाहपुर नपं में बदले सियासी समीकरण

ऐसा ही एक अनोखा और बेहद रोमांचक वाकया प्रदेश के सबसे बड़े जिले कांगड़ा के तहत आती शाहपुर नगर पंचायत में देखने को मिल रहा है। यहां लोकतंत्र के संख्या बल के सिद्धांत को कानून की आरक्षण व्यवस्था ने इस कदर पछाड़ा है कि महज एक सीट जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पूरे सदन पर राज करने की तैयारी में है, जबकि बहुमत का दावा करने वाली कांग्रेस हाथ मलती रह गई है।

 

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सात वार्डों में बिखरा जनादेश

शाहपुर नगर पंचायत में इस बार मतदाताओं ने किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। सात वार्डों वाली इस नगर पंचायत में सबसे ज्यादा भरोसा निर्दलीय प्रत्याशियों पर जताया गया। चुनाव परिणामों में चार सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे, जबकि कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी दो वार्डों में जीत दर्ज कर पाए। भाजपा को केवल एक सीट पर सफलता मिली।

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कांग्रेस के पाले में आने को तैयार निर्दलीय 

यदि संख्या बल के हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस समर्थित खेमे की स्थिति मजबूत नजर आती है, क्योंकि कई निर्दलीय पार्षद कांग्रेस के संपर्क में बताए जा रहे हैं।  चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद कांग्रेस विधायक केवल सिंह पठानिया के साथ कई विजयी उम्मीदवारों की बैठक भी चर्चा का केंद्र बनी रही। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि पांच पार्षद कांग्रेस समर्थित खेमे के साथ खड़े हो सकते हैं।

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फिर भी भाजपा क्यों बना रही अध्यक्ष?

शाहपुर नगर पंचायत की राजनीति में सबसे बड़ा मोड़ अध्यक्ष पद के आरक्षण ने ला दिया है। अध्यक्ष पद इस बार अनुसूचित जनजाति महिला वर्ग के लिए आरक्षित है। पूरे सदन में इस वर्ग से निर्वाचित होने वाली एकमात्र पार्षद भाजपा समर्थित बबिता हैं। ऐसे में कानूनी और तकनीकी रूप से अध्यक्ष पद की सबसे मजबूत दावेदार वही मानी जा रही हैं। यही वजह है कि केवल एक सीट जीतने के बावजूद भाजपा सत्ता की सबसे अहम कुर्सी हासिल करती नजर आ रही है।

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शाहपुर में यह मुकाबला “संख्या बनाम आरक्षण” की राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है। कांग्रेस समर्थित गुट के पास संख्या अधिक होने के बावजूद अध्यक्ष पद तक पहुंचने का रास्ता लगभग बंद दिखाई दे रहा है।

उपाध्यक्ष पद पर होगी असली जंग

अध्यक्ष पद की तस्वीर लगभग साफ मानी जा रही है, लेकिन अब असली सियासी मुकाबला उपाध्यक्ष पद को लेकर शुरू हो गया है। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस समर्थित गुट और निर्दलीय पार्षद उपाध्यक्ष पद पर कब्जा जमाने के लिए रणनीति तैयार कर रहे हैं। आने वाले दिनों में बैठकों, समर्थन जुटाने और राजनीतिक जोड़-तोड़ का दौर और तेज हो सकता है।

 

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पिछले कार्यकाल में भी शाहपुर नगर पंचायत लगातार राजनीतिक उठापटक का केंद्र बनी रही थी। उस दौरान तीन अध्यक्ष बदले गए थे, जबकि कांग्रेस समर्थित विजय गुलेरिया लगातार पांच वर्षों तक उपाध्यक्ष पद पर बने रहे थे। इस बार भी विजय गुलेरिया को उपाध्यक्ष पद का मजबूत दावेदार माना जा रहा है। वहीं कांग्रेस समर्थित राजीव पटियाल का नाम भी चर्चा में है, जो पिछले कार्यकाल में मनोनीत पार्षद रह चुके हैं।

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