शिमला। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस में ब्लॉक अध्यक्षों की हालिया नियुक्तियों ने एक नया राजनीतिक बवंडर खड़ा कर दिया है। संगठन विस्तार के नाम पर जारी की गई 71 अध्यक्षों की सूची अब 'आधी आबादी' की अनदेखी और 'शिमला केंद्रित' राजनीति के आरोपों में घिर गई है। संगठन की मजबूती के लिए की गई 71 ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्तियां अब कांग्रेस के भीतर ही अंतर्कलह का कारण बन गई हैं।
आंकड़ों का खेल: 50% आबादी, 0% प्रतिनिधित्व
सबसे चौंकाने वाला पहलू ये है कि प्रदेश की कुल आबादी में लगभग 50% हिस्सेदारी रखने वाली महिलाओं को एक भी ब्लॉक की कमान नहीं सौंपी गई है।
- विडंबना: ये स्थिति तब है जब राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस 33% महिला आरक्षण की वकालत कर रही है और हिमाचल की पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण प्राप्त है।
- जातीय समीकरण: नियुक्तियों में SC वर्ग (24%) और ST वर्ग (11%) को तो आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिल गया लेकिन महिला नेतृत्व पूरी तरह 'गायब' दिखा।
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विप्लव ठाकुर का सिफारिशी नियुक्तियों पर सवाल
प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेत्री विप्लव ठाकुर ने इस फैसले को सीधे तौर पर चुनौती दी है। उनके विरोध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- जल्दबाजी में फैसला: विप्लव का आरोप है कि ये नियुक्तियां संगठन की मजबूती के लिए नहीं बल्कि जल्दबाजी में केवल खानापूर्ति के लिए की गई हैं।
- पहुंच बनाम योग्यता: उन्होंने स्पष्ट किया कि ये अध्यक्ष विधायकों और रसूखदार नेताओं की सिफारिश पर चुने गए हैं जिससे समर्पित कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है।शिमला तक
- सीमित फीडबैक: उन्होंने प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल शिमला में बैठकर फैसले लेने से जमीनी हकीकत का पता नहीं चलता। प्रभारी को 12 जिलों का दौरा कर फीडबैक लेना चाहिए था।
संगठन बनाम सत्ता: बचाव की कोशिश
विवाद बढ़ता देख पार्टी के भीतर से डैमेज कंट्रोल की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं।
- आशा कुमारी का तर्क: पूर्व मंत्री आशा कुमारी ने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि भले ही ब्लॉक अध्यक्षों में जगह ना मिली हो लेकिन महिलाओं को 'महिला कांग्रेस कमेटी' में उचित स्थान दिया जाएगा। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्य संगठन से महिलाओं को बाहर रखना उन्हें सत्ता के मुख्य केंद्र से दूर रखने जैसा है।
- पंचायती राज बनाम संगठन: हिमाचल की पंचायतों में 52% से अधिक महिलाएं चुनाव जीतकर नेतृत्व कर रही हैं। ऐसे में संगठन में उन्हें जगह ना मिलना भविष्य के चुनावों में कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकता है।
- अंतर्कलह: विप्लव ठाकुर जैसे वरिष्ठ नेताओं का मुखर होना ये दर्शाता है कि संगठन के भीतर 'सब कुछ ठीक नहीं है'।
- विपक्ष को मौका: बीजेपी इस मुद्दे को भुनाकर कांग्रेस को 'महिला विरोधी' करार देने की कोशिश कर सकती है।
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ये विवाद केवल नियुक्तियों का नहीं बल्कि कांग्रेस के भीतर "सत्ता के विकेंद्रीकरण" और "महिला सशक्तिकरण के दावों" की परीक्षा है। अगर संगठन में सुधार नहीं हुआ तो आगामी चुनावों में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा सकती है।
