शिमला। देवभूमि हिमाचल में आज से देवता साहिब नागेश्वर महाराज का ऐताहासिक शांत महायज्ञ शुरू हो गया है। 54 वर्षों बाद आयोजित हो रहे इस दुर्लभ धार्मिक आयोजन को लेकर क्षेत्र में भव्य उत्साह है।
54 साल बाद शांत महायज्ञ
इससे पहले ऐसा आयोजन वर्ष 1971 में हुआ था। अब ये जुब्बल उपमंडल के झड़ग गांव में आयोजित हुआ है जो कि तीन दिन तक चलेगा। इस तीन दिवसीय महायज्ञ में प्रदेशभर से हजारों देवलू, बैठू, मेहमान और लाखों श्रद्धालु शामिल होंगे।
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80 करोड़ से अधिक खर्च
नागेश्वर महाराज के नवनिर्मित मंदिर पर लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की लागत आई है। वहीं, पूरे शांत महायज्ञ के आयोजन में तैयारी, भंडारे, आवास, देव परंपराओं, सुरक्षा और व्यवस्थाओं पर 80 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय होने का अनुमान है।
देवपरपराओं, रीति-रिवाजों की एकजुटता
स्थानीय लोगों, प्रवासियों और मंदिर कमेटी ने मिलकर इस ऐतिहासिक आयोजन को भव्य रूप देने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। मंदिर कमेटी के मोतमीन राय लाल मेहता ने बताया कि इस आयोजन के लिए पूरे क्षेत्र की देवपरंपराएं, रीत-रिवाज और सामाजिक एकजुटता एक मंच पर दिखाई दे रही है।
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11 टोलियों में 500 लोग
पारसा के परशुराम के साथ लगभग 500 देवलू झड़ग पहुंच चुके हैं। वहीं हाटकोटी की घड़ी (मां हाटेश्वरी) के साथ लगभग पांच हजार बैठू शामिल होंगे। क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों से 11 टोलियां इस महायज्ञ में पधार रही हैं। हर टोली में औसतन 500 देवलू मौजूद हैं।
महायज्ञ में ये टोलियां होंगी शामिल
इन टोलियों का स्वागत पारंपरिक वाद्य-यंत्रों की धुन और देवशिष्टाचार के अनुसार किया जा रहा है। इन सभी टोलियों के आगमन से झड़ग गांव में लगातार देवताओं की वंदनाएं, नृत्य और वाद्य-यंत्रों की धुनें गूंज रही हैं।
- छौहारा क्षेत्र: मसली, टोडसा, नंदला, धगोली
- स्पैल वैली: खशकंडी
- मंडलगढ़: भमनोली, गडई
- रोहड़ू: चिऊनी, पाऊली
- नावर क्षेत्र: शेखल, फ्रीऊंकोटी
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दो देवताओं का विशाल देवदल
तंदाली के प्रसिद्ध धौंलू महाराज के साथ लगभग 5,000 देवलू पहुंच रहे हैं, जबकि छूपाड़ी के गुडारू महाराज (घिघाईक खूंद) के साथ लगभग 8,000 देवलू झड़ग पहुंचेंगे। यह आयोजन देवभूमि की अद्वितीय सामाजिक-धार्मिक आस्था का परिचायक बन गया है।
जगा माता को ब्रह्म मुहूर्त में जगाया गया
महायज्ञ की शुरुआत से पूर्व आवश्यक देव-क्रियाओं के तहत मंढोल के झौहटा खूंद के लगभग 100 देवलू मंगलवार शाम को झड़ग पहुंचे। बुधवार तड़के चार बजे ब्रह्म मुहूर्त में झड़ग गांव की जागा माता का जागरण हुआ। इसी के साथ शांत महायज्ञ की आधिकारिक परंपराएं आरंभ हो गईं।
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स्थानीय लोग मेहमाननवाजी में जुटे
शिल्ली तावली रियासत के लोगों ने अपने घरों में बड़े स्तर पर तैयारियां की हैं। मेहमानों की आवभगत के लिए घर-आंगन सजाए गए हैं और स्थानीय व्यंजनों की व्यवस्थाएं की गई हैं। गांवों में सामूहिक भंडारों और निवास स्थलों की व्यवस्था पहले से ही सुनिश्चित कर दी गई है।
महायज्ञ में आएंगे ये देवता
महायज्ञ में जिन प्रमुख देवताओं का आगमन होगा, उनमें शामिल हैं-
- जागा माता अढाल
- मंढोल का झौऊटा खूंद
- शलान का बकरोदा खूंद
- हाटकोटी की घड़ी (मां हाटेश्वरी)
- पारसा के परशुराम
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तीन दिनों तक निभाई जाएंगी रस्में
कमेटी के अनुसार, शांत महायज्ञ में तीन दिन तक महत्वपूर्ण रस्में निभाई जाएंगी। जैसे कि-
- पहला दिन – रास मंडप (धूल जपना)
तंदाली के धौंलू देवता धूल जपना की यह रस्म निभाएंगे। यह देवशक्ति को आमंत्रित करने और महायज्ञ की आध्यात्मिक आधारशिला रखने का विधान माना जाता है।
- दूसरा दिन – शिखा फेर
झड़ग खूंद द्वारा निभाई जाने वाली यह प्राचीन रस्म महायज्ञ की ऊर्जा को स्थिर करने का प्रतीक है।
- तीसरा दिन – उछड़-पाछड़ व प्रस्थान
अंतिम दिन उछड़-पाछड़ की परंपरा के साथ देवता एक-एक कर अपने मूल स्थानों को लौटेंगे। इसमें पारसा का परशुराम, हाटकोटी की घड़ी और सभी 11 टोलियां शामिल होंगी।
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शांत महायज्ञ का महत्व
शांत महायज्ञ की परंपरा मूल रूप से बठोलीगड़ क्षेत्र के डिस्वाणी गांव से चली है। यह आयोजन नागेश्वर महाराज के सम्मान में किया जाता है। इसका उद्देश्य देवशक्तियों को शांत कर क्षेत्र में सुख, स्वास्थ्य, समृद्धि और प्राकृतिक अनुकूलता का आशीर्वाद प्राप्त करना है।
