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March 14, 2026

सुक्खू सरकार को झटका: बिजली प्रोजेक्टों पर भू-राजस्व मामला पहुंचा हाईकोर्ट, कहीं वाटर सेस की तरह...

हिमाचल हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार से मांगा जवाब

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himachal High Court

शिमला। हिमाचल प्रदेश की चरमराती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार एक के बाद एक कड़े फैसले ले रही है, लेकिन सरकार की इन कोशिशों पर अदालत की सख्ती भारी पड़ती दिख रही है। प्रदेश के खाली खजाने को भरने के लिए सरकार ने जलविद्युत परियोजनाओं पर दांव खेला था, लेकिन अब यह मामला भी कानूनी पेचीदगियों में फंस गया है।

 वॉटर सेस के बाद लगाया था भू राजस्व 

हिमाचल सरकार ने पहले जलविद्युत परियोजनाओं पर वॉटर सेस (Water Cess) लगाकर भारी राजस्व जुटाने की योजना बनाई थी। लेकिन कंपनियों की चुनौती के बाद हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकार के इस फैसले को निरस्त कर दिया, जिससे सरकार को तगड़ा झटका लगा। इस हार के बाद सुक्खू सरकार ने रणनीति बदली और हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम 1954 में संशोधन कर परियोजनाओं पर 2 % भू-राजस्व लगाने का निर्णय लिया। लेकिन अब यह नया दांव भी हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुंच गया है।

 

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सरकार ने 1 जनवरी 2026 से राज्य में संचालित जलविद्युत परियोजनाओं के औसत बाजार मूल्य पर दो प्रतिशत भू.राजस्व वसूलने का प्रावधान लागू किया था। सरकार का अनुमान है कि इस फैसले से हर साल करीब 1800 से 2000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है।

23 मार्च को होगी सुनवाई

शुक्रवार को न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने निजी कंपनियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च 2026 को तय की गई है।

 

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सरकार के फैसल को हाईकोर्ट में चुनौती

सुक्खू सरकार के इस फैसले को अब अदालत में चुनौती दे दी गई है। याचिकाओं में सरकार की 6 अक्तूबर, 1 दिसंबर और 11 दिसंबर 2025 की अधिसूचनाओं को रद्द करने की मांग की गई है। कंपनियों का कहना है कि संविधान के तहत सरकार केवल भूमि पर राजस्व लगा सकती है, लेकिन सरकार पूरे प्रोजेक्ट के औसत बाजार मूल्य पर 2 % टैक्स वसूलना चाहती है, जो कि पूरी तरह असांविधानिक है। वहीं यह कदम भू-राजस्व अधिनियम 1954 के मूल प्रावधानों के खिलाफ है।

 

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सरकार की मजबूरी: 2000 करोड़ का सवाल

दूसरी ओर राज्य सरकार का कहना है कि प्रदेश की वित्तीय स्थिति बेहद गंभीर है। केंद्र से मिलने वाले राजस्व घाटा अनुदान  में कटौती के बाद प्रदेश को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए राजस्व के नए स्रोत तलाशना अनिवार्य है। सुक्खू सरकार का मानना है कि बिजली प्रोजेक्टों पर भू-राजस्व से सालाना 1800 से 2000 करोड़ रुपये की कमाई होगी। यह टैक्स कुल 191 परियोजनाओं पर लागू होगा।

अब सरकार के सामने बड़ा सवाल

अब भू.राजस्व के इस नए फैसले के भी अदालत में पहुंचने के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। यदि अदालत सरकार के इस कदम पर भी रोक लगा देती हैए तो राज्य सरकार के सामने राजस्व बढ़ाने के विकल्प और सीमित हो सकते हैं। हिमाचल प्रदेश पहले ही बढ़ते कर्ज और वित्तीय दबाव से जूझ रहा है। ऐसे में सरकार की कोशिश है कि जलविद्युत क्षेत्र जैसे बड़े संसाधनों से अतिरिक्त आय जुटाकर आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जाए। लेकिन अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला यह तय करेगा कि सरकार की राजस्व बढ़ाने की यह नई रणनीति लागू हो पाएगी या नहीं।

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