चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा में आयोजित होने वाला अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला एक ऐतिहासिक उत्सव है। ये उत्सव सदियों से लोगों को संदेश देता आ रहा है कि धर्म और मजहब से ऊपर इंसानियत और श्रद्धा का स्थान होता है।
अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला शुरू
जब समाज में धर्म के नाम पर विभाजन की बातें होती हैं। तब चंबा की धरती से उठने वाली मिंजर की परंपरा प्रेम, भाईचारे और आपसी सम्मान का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाती है।
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मिंजर मेला क्यों है खास?
इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी शुरुआत किसी राजा, पुजारी या प्रशासनिक अधिकारी द्वारा नहीं, बल्कि एक मुस्लिम परिवार द्वारा भगवान रघुवीर को पहला मिंजर अर्पित करने की परंपरा से होती है। यही परंपरा इस मेले को देश के अन्य धार्मिक आयोजनों से अलग पहचान देती है।
लगभग एक हजार वर्षों से जीवित है परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार, मिंजर मेले की परंपरा लगभग 935 ईस्वी से चली आ रही है। समय बदला, राजवंश बदले, शासन व्यवस्थाएं बदलीं, लेकिन मिंजर मेले की मूल भावना कभी नहीं बदली। आज भी वही परंपराएं पूरे सम्मान के साथ निभाई जाती हैं, जो सदियों पहले शुरू हुई थीं।
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इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला 26 जुलाई से 2 अगस्त तक आयोजित किया जा रहा है। पूरे सप्ताह चलने वाले इस महोत्सव में भगवान रघुवीर और भगवान लक्ष्मीनारायण की विशेष पूजा-अर्चना, पारंपरिक शोभायात्राएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और अंत में रावी नदी में मिंजर विसर्जन का भव्य आयोजन होगा।
आठवीं पीढ़ी आज भी निभा रही जिम्मेदारी
मिंजर मेले की सबसे अनूठी परंपरा मिर्जा परिवार से जुड़ी हुई है। यह परिवार पीढ़ियों से अपने हाथों से मिंजर तैयार करता आ रहा है। इस बार परिवार की आठवीं पीढ़ी ने पारंपरिक विधि से मिंजर तैयार की है। वर्षों से चली आ रही इस जिम्मेदारी को परिवार आज भी पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभा रहा है।
मेले के उद्घाटन अवसर पर मिर्जा परिवार का सबसे वरिष्ठ सदस्य भगवान रघुवीर को सबसे पहले मिंजर अर्पित करता है। इस वर्ष यह सम्मान एजाज मिर्जा को प्राप्त होगा।
शाहजहां के दौर से जुड़ी है ऐतिहासिक कहानी
मिंजर मेले की परंपरा के पीछे एक रोचक ऐतिहासिक कथा भी प्रचलित है। बताया जाता है कि मुगल सम्राट शाहजहां के शासनकाल में सूर्यवंशी राजा पृथ्वी सिंह भगवान रघुवीर की प्रतिमा को चंबा लेकर आए थे। उस समय शाहजहां ने अपने विश्वस्त प्रतिनिधि मिर्जा सफी बेग को राजदूत के रूप में उनके साथ भेजा था।
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मिर्जा सफी बेग जरी-गोटे की उत्कृष्ट कारीगरी के लिए प्रसिद्ध थे। चंबा पहुंचने के बाद उन्होंने रेशमी धागों और सुनहरी जरी से सुंदर मिंजर तैयार कर भगवान रघुवीर, भगवान लक्ष्मीनारायण और राजा पृथ्वी सिंह को भेंट की। तभी से यह परंपरा शुरू हुई, जो आज भी उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जा रही है।
खुशी से शुरू हुआ था उत्सव
मान्यता है कि यह उत्सव उस समय प्रारंभ हुआ, जब राजा पृथ्वी सिंह युद्ध जीतकर सकुशल चंबा लौटे थे। उनकी विजय और राज्य की खुशहाली के उपलक्ष्य में लोगों ने उत्सव मनाया, जो समय के साथ मिंजर मेले के रूप में स्थापित हो गया। बाद में इसमें धार्मिक, सांस्कृतिक और लोक परंपराएं जुड़ती चली गईं और यह आयोजन अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त कर गया।
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पाकिस्तान तक पहुंची थी मिंजर मेले की परंपरा
बहुत कम लोग जानते हैं कि चंबा का मिंजर मेला कभी वर्तमान पाकिस्तान में भी मनाया जाता था। विभाजन से पहले और उसके बाद भी कई वर्षों तक रावलपिंडी जिले के कोहटा क्षेत्र के मोहल्ला कश्मीरी में चंबा की तर्ज पर मिंजर उत्सव आयोजित होता रहा। वहां रहने वाले लोग भी उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ इस पर्व को मनाते थे।
बताया जाता है कि वर्ष 1992 तक यह परंपरा जारी रही। बाद में वहां के स्थानीय संरक्षक मुस्लिम राजा इकबाल के निधन के बाद यह आयोजन बंद हो गया। हालांकि नगर परिषद चंबा के अभिलेखों में आज भी इस ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख सुरक्षित है।
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ऐसे निभाई जाती हैं प्रमुख परंपराएं
मिंजर मेले का शुभारंभ भगवान रघुवीर की भव्य शोभायात्रा से होता है। इस यात्रा में चंबा और आसपास के क्षेत्रों से 200 से अधिक देवी-देवताओं की पालकियां शामिल होती हैं। पारंपरिक वाद्य यंत्रों, लोक नृत्यों और धार्मिक जयघोषों के बीच पूरी चंबा नगरी भक्तिमय वातावरण में डूब जाती है।
कहां से शुरू होती है शोभायात्रा?
शोभायात्रा अखंड चंडी महल से शुरू होकर ऐतिहासिक चौगान मैदान से गुजरते हुए रावी नदी के तट तक पहुंचती है। यहां लाल कपड़े में लिपटा नारियल, एक रुपया, मौसमी फल, मिठाई और मिंजर नदी में प्रवाहित किए जाते हैं। इस अनुष्ठान के माध्यम से अच्छी फसल, समृद्धि, सुख-शांति और जनकल्याण की कामना की जाती है।
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आखिर क्या होती है मिंजर?
'मिंजर' शब्द का संबंध मक्की की फसल पर आने वाले फूल से माना जाता है, जो अच्छी पैदावार और समृद्धि का प्रतीक है। परंपरागत मिंजर रेशमी धागों, सुनहरी जरी, गोटे और मखमली कपड़े से बनाई जाती है। इसे श्रद्धालु अपने वस्त्रों पर बांधते हैं और पूरे मेले के दौरान धारण करते हैं।
रावी नदी में मिंजर प्रवाहित
मेले के अंतिम दिन सभी श्रद्धालु अपनी-अपनी मिंजर रावी नदी में प्रवाहित करते हैं। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि प्रकृति, कृषि, समृद्धि और सामाजिक एकता के प्रति सम्मान व्यक्त करने का प्रतीक माना जाता है।
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संस्कृति, आस्था और भाईचारे का अद्भुत संगम
अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला केवल चंबा का उत्सव नहीं है, बल्कि यह हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यहां सदियों से निभ रही वह परंपरा आज भी लोगों को यह सिखाती है कि समाज की वास्तविक ताकत आपसी विश्वास, सम्मान और भाईचारे में होती है।
मुस्लिम परिवार की बनाई मिंजर
एक मुस्लिम परिवार द्वारा भगवान रघुवीर को पहला मिंजर अर्पित करने की परंपरा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति विविधताओं में एकता का संदेश केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं में भी जीवित रखती है।
