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September 10, 2026
हिमाचल के ऐतिहासिक दशहरा उत्सव की तैयारियां शुरू, 347 देवी-देवताओं को भेजे निमंत्रण
इस बार कुल्लू दशहरा में 15 नए देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया है
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कुल्लू। देवभूमि हिमाचल की समृद्ध देव परंपरा और संस्कृति का सबसे बड़ा पर्व माने जाने वाले अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस वर्ष दशहरा महोत्सव में जिले के 347 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया है।
खास बात यह है कि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार 15 अधिक देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है। वर्ष 2025 में कुल 332 देवी-देवताओं को दशहरा में शामिल होने के लिए बुलाया गया था।
इस बार अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा का आयोजन 21 अक्टूबर से 27 अक्टूबर तक किया जाएगा। यानी सात दिनों तक ढालपुर मैदान में देव संस्कृति, आस्था और लोक परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिलेगा।
हर वर्ष की तरह इस बार भी देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के कुल्लू पहुंचने की उम्मीद है। विदेशों से आने वाले पर्यटक भी इस ऐतिहासिक देव उत्सव का हिस्सा बनते हैं।
कुल्लू दशहरा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिमाचल की लोक संस्कृति, देव परंपराओं, हस्तशिल्प, व्यापार और पर्यटन को भी व्यापक मंच प्रदान करता है। महोत्सव के दौरान ढालपुर और आसपास के क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।
इससे स्थानीय कारोबारियों, दुकानदारों, होटल, टैक्सी और पर्यटन से जुड़े लोगों को भी आर्थिक लाभ मिलता है। दशहरा के दौरान होने वाली आर्थिक गतिविधियों से करोड़ों रुपये का कारोबार होने का अनुमान रहता है।
कुल्लू दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में भगवान रघुनाथ की शोभायात्रा का विशेष स्थान है। दशहरा उत्सव की शुरुआत भगवान रघुनाथ की अगुवाई में निकलने वाली शोभायात्रा से होती है। इसके बाद विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे देवी-देवता ढालपुर मैदान में विराजमान होते हैं।

कुल्लू दशहरा का इतिहास कई सदियों पुराना है। वर्ष 1660 ईस्वी से चली आ रही इस परंपरा में भगवान रघुनाथ को केंद्र में रखकर देव समाज की विभिन्न परंपराएं निभाई जाती हैं। सात दिनों के दौरान ढालपुर मैदान में बड़ी संख्या में देवी-देवताओं के दर्शन के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। देवताओं के साथ आने वाले कारदार और देवलू भी इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।
दशहरा में शामिल होने वाले देवी-देवताओं को भेजे जाने वाले निमंत्रण के आधार पर प्रशासन और दशहरा उत्सव समिति की ओर से व्यवस्थाएं तैयार की जाती हैं। इनमें देवी-देवताओं के ठहरने, नजराने और अन्य आवश्यक सुविधाओं से संबंधित प्रबंध शामिल होते हैं।
कुल्लू दशहरा की विशेषता यह भी है कि इसमें शामिल होने वाले सभी देवी-देवता आसपास के क्षेत्रों से नहीं आते। कई देवताओं के कारदार और देवलू बेहद लंबा सफर तय करके कुल्लू पहुंचते हैं।
आनी और निरमंड क्षेत्र से आने वाले कुछ देवी-देवताओं को करीब 200 किलोमीटर तक का सफर करना पड़ता है। भगवान रघुनाथ की चाकरी के लिए देव समाज के लोग अपने देवताओं के साथ कुल्लू की ओर रवाना होते हैं। दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले कई देवी-देवता दशहरा शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले ही अपने देवालयों से यात्रा शुरू कर देते हैं।
यह यात्रा अपने आप में हिमाचल की प्राचीन देव संस्कृति की एक झलक प्रस्तुत करती है। रास्ते में देवता के साथ चलने वाले कारदार, देवलू और श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए कुल्लू पहुंचते हैं।
दशहरा आयोजन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियों का सिलसिला शुरू हो चुका है। हालांकि देव समाज की ओर से व्यापक स्तर पर तैयारियां अक्तूबर के दूसरे सप्ताह से शुरू होने की संभावना है। इस दौरान देवी-देवताओं के कुल्लू रवाना होने और उनके साथ आने वाले कारदारों व देवलुओं की व्यवस्थाओं पर भी काम किया जाएगा।
कार्यवाहक उपायुक्त कुल्लू सुरजीत सिंह राठौर के अनुसार, इस वर्ष 21 से 27 अक्टूबर तक होने वाले दशहरा महोत्सव के लिए जिले के 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है। वहीं जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर ने बताया कि अधिकांश देवी-देवताओं तक दशहरा का निमंत्रण पहुंच चुका है। अक्तूबर के दूसरे सप्ताह से देव समाज महोत्सव की तैयारियों में जुट जाएगा।
इस बार कुल्लू दशहरा में 15 नए देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2025 में जहां 332 देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया गया था, वहीं इस बार यह संख्या बढ़कर 347 हो गई है।
इससे देव समाज की भागीदारी का दायरा और व्यापक होगा। अलग-अलग क्षेत्रों से देवी-देवताओं के कुल्लू पहुंचने के बाद ढालपुर मैदान में देव संस्कृति का भव्य स्वरूप देखने को मिलेगा। हजारों श्रद्धालुओं के लिए यह अवसर हिमाचल की सदियों पुरानी परंपराओं को करीब से देखने और समझने का माध्यम भी बनता है।
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण शोधार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण विषय रहा है। हिमाचल की देव संस्कृति, लोक मान्यताओं, पारंपरिक व्यवस्थाओं और देवी-देवताओं से जुड़े रीति-रिवाजों को समझने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों से शोधकर्ता यहां पहुंचते हैं।
दशहरा के दौरान एक ही स्थान पर बड़ी संख्या में देवी-देवताओं का एकत्र होना अपने आप में अनूठी परंपरा है। देवताओं के साथ आने वाले कारदारों, देवलुओं और श्रद्धालुओं की भूमिका, पारंपरिक अनुष्ठान और भगवान रघुनाथ से जुड़ी मान्यताएं इस उत्सव को अन्य मेलों और त्योहारों से अलग पहचान देती हैं।
कुल्लू दशहरा के इतिहास में वर्ष 2020 का आयोजन भी विशेष रूप से याद किया जाता है। कोरोना महामारी के कारण उस समय देशभर में सार्वजनिक आयोजनों पर कड़े प्रतिबंध और स्वास्थ्य संबंधी नियम लागू थे। कोविड-19 के कारण कुल्लू दशहरा में सामान्य वर्षों की तरह बड़ी संख्या में देवी-देवताओं को आमंत्रित नहीं किया गया था।
उस वर्ष प्रशासन की ओर से केवल सात देवी-देवताओं को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया था। मगर कुल 13 देवी-देवता दशहरा में पहुंचे। सीमित भागीदारी के बावजूद देव समाज ने परंपरा को पूरी तरह समाप्त नहीं होने दिया और उपलब्ध परिस्थितियों में देव विधि के अनुसार दशहरा की रस्में निभाई गईं।