शिमला। हिमाचल प्रदेश की बेटियां खेल के मैदान में देश का नाम रोशन कर रही हैं, लेकिन सरकार का व्यवहार सभी के प्रति समान नहीं दिख रहा। जहां विश्व कप जीतने पर महिला क्रिकेटर रेणुका ठाकुर को एक करोड़ रुपये का इनाम और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की गई, वहीं खो.खो विश्व कप जीतने वाली हिमाचल की खिलाड़ी नीता राणा अब भी सरकारी मदद और प्रोत्साहन की राह देख रही हैं। प्रदेश सरकार की इस दोहरी नीति को लेकर खेल जगत और सामाजिक हलकों में सवाल उठने लगे हैं। आखिर क्यों एक ही प्रदेश की दो विश्व विजेता बेटियों के साथ इतना अलग व्यवहार किया जा रहा है।
रेणुका ठाकुर को एक करोड़ और नौकरी का वादा
2025 महिला क्रिकेट विश्व कप जीतने के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने रेणुका ठाकुर से फोन पर बात कर उन्हें एक करोड़ रुपये की पुरस्कार राशि और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी। इस फैसले की पूरे प्रदेश में तारीफ हुई, क्योंकि रेणुका ने अपने संघर्ष और मेहनत से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को गौरवान्वित किया। लेकिन इसी जीत के कुछ ही महीने पहले जनवरी 2025 में हिमाचली के कुल्लू के खराहल गांव की बेटी नीता राणा ने भी खो खो में विश्व ख्याति हासिल की। हिमाचल की बेटी नीता राणा खो.खो विश्व कप विजेता भारतीय टीम का हिस्सा रही हैं, आज सरकारी अनदेखी की शिकार हैं।
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नीता राणा सरकारी मदद से वंचित
जनवरी 2025 में दिल्ली में आयोजित पहले खो-खो विश्व कप में भारत की महिला टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए खिताब अपने नाम किया। इस टीम में हिमाचल की नीता राणा भी शामिल थीं। लेकिन जहां बाकी खेलों में राज्य सरकार ने खुलकर खिलाड़ियों को सम्मानित किया, वहीं नीता को आज तक न कोई इनाम मिला, न कोई सम्मान समारोह में बुलावा।
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क्या कहती है नीता राणा
जब मैं वर्ल्ड कप जीतकर लौटी, तो उम्मीद थी कि सरकार हमारी उपलब्धि को सम्मानित करेगी। लेकिन दस महीने बीत गए, किसी ने अब तक कोई ध्यान नहीं दिया। लोग पूछते हैं तुम्हें क्या मिला। तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होता। कई बार ताने सुनने पड़ते हैं कि खेलकर क्या हासिल किया। ऐसे में मनोबल टूट जाता है।
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नीता राणा एक किसान परिवार से आती हैं। पिता खेती करते हैं और मां गृहिणी हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने खेल से कभी नाता नहीं तोड़ा। उन्होंने बचपन में अपने भाई-बहनों को खो-खो खेलते देखा और प्रेरित होकर मैदान में उतर पड़ीं। तीसरी कक्षा से खो.खो खेलना शुरू किया और अब तक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक अपने नाम किए।
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नीता राणा कहती हैं
हमने भी देश के लिए विश्व कप जीता, फिर भी हमें न कोई आर्थिक सहायता मिली, न नौकरी। सरकार क्रिकेट को तो महत्व दे रही है, लेकिन अन्य खेलों को नज़रअंदाज़ कर रही है। अगर सरकार खिलाड़ियों के बीच ऐसा भेदभाव करेगी, तो ग्रामीण इलाकों के बच्चे खेलों की ओर कैसे बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि हिमाचल सरकार को चाहिए कि खेल नीति के तहत सभी खिलाड़ियों को समान प्रोत्साहन दे। जिन खिलाड़ियों ने देश के लिए मेडल या खिताब जीता है, उन्हें उनकी उपलब्धियों के अनुसार इनामी राशि और नौकरी का अधिकार मिले।
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खेल नीति पर उठे सवाल
हिमाचल प्रदेश की खेल नीति में यह प्रावधान है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों को सरकारी मान्यता, प्रोत्साहन और पुरस्कार राशि दी जाएगी। लेकिन खो-खो जैसे पारंपरिक खेलों को अब भी मुख्यधारा के बाहर रखा जा रहा है। खेल विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को खेलों के बीच भेदभाव खत्म कर, सभी विधाओं के खिलाड़ियों को समान अवसर देने की आवश्यकता है।
