हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने तलाक के बाद पत्नी के भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने साफ किया कि सिर्फ तलाक हो जाने से महिला का पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। अगर महिला ने दोबारा शादी नहीं की है- तो परिस्थितियों के अनुसार वह पूर्व पति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है।

फैमिली कोर्ट का फैसला

न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की पीठ ने पति की पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए हमीरपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी के लिए हर महीने 4,000 रुपये गुजारा भत्ता तय किया गया था।

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क्या है पूरा मामला?

हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड की जांच के बाद कहा कि ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि तलाक के बाद पत्नी ने दूसरी शादी कर ली है। ऐसे में सिर्फ वैवाहिक रिश्ता खत्म हो जाने के आधार पर उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।

नहीं बच सकता पति

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सक्षम और कमाई करने की स्थिति में मौजूद पति अपनी जिम्मेदारी से केवल उम्र या स्वास्थ्य संबंधी सामान्य दलील देकर नहीं बच सकता। अगर पति अपनी शारीरिक अक्षमता का दावा करता है तो उसके समर्थन में ठोस प्रमाण भी होना चाहिए।

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पति ने कोर्ट में रखी अपनी बात

मामले में हमीरपुर की फैमिली कोर्ट ने पति की आय का आकलन करते हुए मासिक कमाई 11,250 रुपये मानी थी। यह आकलन न्यूनतम मजदूरी से संबंधित अधिसूचना को आधार बनाकर किया गया था।

पत्नी को 4000 भरण-पोषण

इसी आय को देखते हुए पत्नी के लिए 4,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण निर्धारित किया गया था। हाईकोर्ट ने इस राशि को परिस्थितियों के अनुरूप उचित माना और फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। अदालत ने पति को निर्देश दिया कि आदेश पारित होने के चार सप्ताह के भीतर पत्नी को बकाया भरण-पोषण की रकम का भुगतान किया जाए।

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1997 में हुई थी शादी

यह मामला हमीरपुर से संबंधित है। अपीलकर्ता सुरजीत और सावित्री देवी का विवाह 21 दिसंबर 1997 को हुआ था। वैवाहिक जीवन के दौरान दोनों के तीन बच्चे हुए।

पत्नी की ओर से आरोप लगाया गया कि शादी के बाद पति का व्यवहार उसके प्रति बदल गया और उसे कथित तौर पर दुर्व्यवहार, मारपीट तथा शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। पत्नी ने इसी तरह की परिस्थितियों को आधार बनाते हुए वर्ष 2019 में क्रूरता के आधार पर तलाक की कार्यवाही शुरू की।

2021 में हुआ तालाक

मामले की सुनवाई के बाद 22 नवंबर 2021 को फैमिली कोर्ट ने दोनों के बीच तलाक को मंजूरी दे दी। हालांकि वैवाहिक संबंध खत्म होने के बाद भी पत्नी ने अपने भरण-पोषण के लिए कानूनी कार्यवाही जारी रखी।

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अदालत ने सुनाया फैसला

पत्नी ने CRPC की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता हासिल करने के लिए आवेदन किया था। इसी मामले में हमीरपुर फैमिली कोर्ट ने 23 जनवरी 2024 को अपना फैसला सुनाया। फैमिली कोर्ट ने आदेश दिया कि पति पत्नी को 18 मई 2019 से हर महीने 4,000 रुपये की दर से भरण-पोषण का भुगतान करे।

हाईकोर्ट पहुंचा पति

फैमिली कोर्ट के आदेश से असंतुष्ट पति ने हाईकोर्ट का रुख किया। उसकी ओर से दलील दी गई कि वह दिहाड़ी मजदूरी करता है और उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य खराब होने के कारण अब नियमित रूप से कमाई करने की स्थिति में नहीं है।

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पत्नी उठा सकती है खर्चा

पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी सिलाई का काम करती है और खुद अपना खर्च उठा सकती है। उसकी ओर से यह तर्क भी रखा गया कि पत्नी अपनी इच्छा से उससे अलग हुई थी और अब दोनों के बीच तलाक भी हो चुका है। इसलिए तलाक के बाद पत्नी को पूर्व पति से भरण-पोषण मिलने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

पति ने लिया था बिजनेस लोन

हाईकोर्ट ने पति की दलीलों के साथ रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेजों को भी देखा। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि पति ने 93,000 रुपये का बिजनेस लोन लिया था।

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कोर्ट में फंसा पति

पीठ ने इसी बिंदु को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति खुद को केवल सामान्य दिहाड़ी मजदूर बता रहा है- तो उसके नाम पर बिजनेस लोन लिया जाना उसकी आर्थिक गतिविधियों को लेकर अलग तस्वीर पेश करता है।

ठेकेदारी से करता है पति

अदालत ने इस तथ्य को पत्नी के उस दावे के समर्थन में भी देखा कि पति ठेकेदारी से जुड़ा काम करता है। यानी पति की वास्तविक कमाई उसकी ओर से बताए गए साधारण मजदूरी के काम तक सीमित होने की बात रिकॉर्ड से पूरी तरह साबित नहीं होती।

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सेहत खराब रहना बहाना नहीं....

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि व्यक्ति उम्र या खराब स्वास्थ्य के कारण कमाने में सक्षम नहीं है। अगर कोई स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति अपने ऊपर भरण-पोषण की जिम्मेदारी से मुक्त होने का दावा करता है, तो उसे अपनी शारीरिक अक्षमता के समर्थन में विश्वसनीय और ठोस सामग्री अदालत के सामने रखनी होगी।

पत्नी के हक में फैसला

पीठ ने उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा पर्याप्त प्रमाण नहीं पाया, जिससे यह माना जा सके कि पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह असमर्थ है। सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पति की पुनर्विचार याचिका को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित 4,000 रुपये मासिक भरण-पोषण को उचित माना।

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