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September 22, 2026
हिमाचल हाईकोर्ट का अहम फैसला : पहली पत्नी के निधन के बाद दूसरी का पेंशन पर पूरा हक
पहली पत्नी की बहन से ही की थी शख्स से शादी
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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने फैमिली पेंशन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि अगर दूसरी शादी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध न भी हो- तो भी मामले की परिस्थितियों, लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक सहवास, सामाजिक न्याय और आर्थिक सुरक्षा के पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पहली पत्नी की मृत्यु के बाद परिस्थितियों के आधार पर दूसरी पत्नी को सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज कर फैमिली पेंशन का लाभ दिए जाने पर विचार किया जा सकता है। यह मामला महेश राम से संबंधित है- जो वर्ष 2003 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे और इसके बाद पेंशन प्राप्त कर रहे थे। उनकी पहली पत्नी कमलेश देवी का 20 अप्रैल 2020 को निधन हो गया था। दंपती की कोई संतान नहीं थी।
महेश राम ने पहली पत्नी के जीवित रहते उनकी बहन ज्वाला देवी से दूसरी शादी की थी। पहली पत्नी के निधन के बाद उन्होंने पेंशन पेमेंट ऑर्डर (पीपीओ) और सरकारी सर्विस रिकॉर्ड में ज्वाला देवी का नाम दर्ज करने का अनुरोध किया।
हालांकि राज्य सरकार और संबंधित विभाग ने उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। विभाग का तर्क था कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 के प्रावधानों के तहत पहली पत्नी के जीवित रहते की गई दूसरी शादी वैध नहीं थी। साथ ही विभाग ने सीसीएस (पेंशन) नियम, 1972 का हवाला देते हुए ज्वाला देवी को फैमिली पेंशन का लाभ देने से इनकार कर दिया।
सरकारी विभाग के निर्णय के खिलाफ महेश राम ने हाईकोर्ट में सिविल रिट याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद सिंगल जज ने 17 सितंबर, 2025 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि पहली पत्नी कमलेश देवी की मृत्यु के बाद सर्विस रिकॉर्ड में दूसरी पत्नी ज्वाला देवी का नाम दर्ज किया जाए। सिंगल जज के इस आदेश को राज्य सरकार ने चुनौती देते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।
मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों पर फैसला करते समय केवल कानूनी प्रावधानों की पारंपरिक व्याख्या तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक परिस्थितियों और न्याय के व्यापक उद्देश्य को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं होता। लेकिन पहली पत्नी की मृत्यु के बाद मामले की परिस्थितियों और लंबे समय तक साथ रहने जैसे तथ्यों को देखते हुए दूसरी पत्नी को आर्थिक सुरक्षा से पूरी तरह वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तीकरण के पहलू पर भी ध्यान दिया। अदालत की टिप्पणी का मूल आधार यह रहा कि पेंशन व्यवस्था का उद्देश्य आश्रित परिवार के सदस्यों को आर्थिक संरक्षण उपलब्ध कराना भी है।
अदालत ने कहा कि कानून की व्याख्या करते समय ऐसे सामाजिक संदर्भों को भी ध्यान में रखना चाहिए- जिनमें किसी महिला के आर्थिक रूप से बेसहारा होने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। पहली पत्नी के निधन के बाद लंबे समय से पति के साथ रह रही दूसरी पत्नी के मामले में परिस्थितियों के अनुरूप आर्थिक संरक्षण के प्रश्न पर विचार किया जा सकता है।