शिमला। हिमाचल प्रदेश की बर्फीली चोटियों के बीच तेजी से फैल रही ग्लेशियर झीलें अब सिर्फ पर्यावरण वैज्ञानिकों की चिंता नहीं रह गई हैं, बल्कि आने वाले बड़े प्राकृतिक संकट का संकेत बनती जा रही हैं। जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ते तापमान ने हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है। जिन क्षेत्रों में कभी बर्फबारी सामान्य थी, वहां बारिश और रेन-ऑन-स्नो जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। इसका सीधा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। बर्फ तेजी से पिघल रही है और उसका पानी नई झीलों को जन्म देने के साथ पुरानी झीलों का आकार भी बढ़ा रहा है।

 

हिमाचल की स्थिति को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रदेश धीरे-धीरे एक ऐसे ‘टाइम बम’ पर बैठता जा रहा है, जिसकी टिक-टिक पहाड़ों की ऊंचाइयों पर सुनाई नहीं देती, लेकिन जिसका असर नीचे बसे इलाकों में बेहद विनाशकारी हो सकता है। विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन ग्लेशियर झीलों के प्राकृतिक बांध कमजोर हैं। भारी बारिश, बादल फटना, भूस्खलन, हिमस्खलन, रॉकफॉल या भूकंपीय हलचल जैसे किसी भी ट्रिगर से अचानक झील टूट सकती है और कुछ ही समय में हजारों-लाखों घन मीटर पानी नीचे की ओर तबाही मचा सकता है।

34 साल में 107 से बढ़कर 669 हुईं ग्लेशियर झीलें

हिमाचल में ग्लेशियर झीलों के तेजी से बढ़ते खतरे की गंभीर तस्वीर आईआईटी रोपड़ और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी, ऑस्ट्रेलिया के संयुक्त अध्ययन में सामने आई है। शोधकर्ताओं ने हिमाचल प्रदेश में 0.02 वर्ग किलोमीटर या इससे अधिक क्षेत्रफल वाली 94 ग्लेशियर झीलों का विस्तृत आकलन किया है।

 

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अध्ययन के मुताबिक इनमें से 88 झीलें बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील पाई गई हैं। यह अध्ययन वर्ष 1990 से 2024 तक के 34 वर्षों के उपग्रह चित्रों और जलवायु संबंधी आंकड़ों पर आधारित है और इसे International Journal of Hydrology: Regional Studies में प्रकाशित किया गया है। सबसे चौंकाने वाली बात झीलों की संख्या में हुई वृद्धि है। वर्ष 1990 में हिमाचल में ग्लेशियर झीलों की संख्या 107 थी, जो वर्ष 2024 तक बढ़कर 669 हो गई। यानी महज 34 वर्षों में इनकी संख्या में करीब 525 फीसदी का इजाफा हुआ।

छोटी झीलों की बाढ़ बनी सबसे बड़ी चिंता

ग्लेशियर झीलों का खतरा केवल बड़ी झीलों तक सीमित नहीं है। शोध में छोटी झीलों की तेजी से बढ़ती संख्या ने भी वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई है। 1990 में हिमाचल में 0.01 वर्ग किलोमीटर से कम क्षेत्रफल वाली केवल नौ झीलें दर्ज की गई थीं। वर्ष 2024 में इनकी संख्या बढ़कर 487 हो गई। इसका अर्थ है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ के पिघलने के साथ बड़ी संख्या में छोटी-छोटी जलराशियां विकसित हो रही हैं। वहीं सभी ग्लेशियर झीलों का कुल क्षेत्रफल भी 1990 में 5.54 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2024 में 11.20 वर्ग किलोमीटर हो गया। यानी झीलों का कुल क्षेत्रफल लगभग दोगुना हो चुका है।

 

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94 में से 73 झीलों के प्राकृतिक बांध अस्थिर

खतरा सिर्फ झीलों की संख्या और आकार बढ़ने से नहीं है। असली चिंता इन झीलों को रोकने वाले प्राकृतिक बांधों की मजबूती को लेकर है। अध्ययन में शामिल 94 प्रमुख झीलों में से 73 के मोरेन बांधों को संरचनात्मक रूप से अस्थिर पाया गया है। मोरेन यानी चट्टानों, मिट्टी, बर्फ और अन्य मलबे से बने प्राकृतिक बांध किसी इंजीनियरिंग बांध की तरह मजबूत और नियंत्रित संरचना नहीं होते। झील में पानी का दबाव लगातार बढ़ने पर इनका टूटना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। 

 

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58 झीलों के नीचे भूकंप और टेक्टोनिक फॉल्ट का खतरा

अध्ययन ने हिमाचल की चिंता को और गंभीर बना दिया है। 58 ग्लेशियर झीलें ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं जहां सक्रिय भूकंपीय गतिविधियों और टेक्टोनिक फॉल्ट का खतरा मौजूद है। यानी जिन झीलों के प्राकृतिक बांध पहले से कमजोर हैं, उनके आसपास भूकंपीय हलचल भी संभावित खतरा बन सकती है। इसके अलावा 52 झीलों में आइस-कोर के पिघलने से रिसाव और बांध टूटने का जोखिम सामने आया है। वहीं 44 झीलों की ढलानों पर रॉकफॉल का खतरा दर्ज किया गया है। पहाड़ों से बड़े पत्थरों या चट्टानों के झील में गिरने से अचानक पानी विस्थापित हो सकता है और प्राकृतिक बांध पर दबाव बढ़ सकता है।

नौ झीलें ‘अति उच्च जोखिम’ वाली

शोधकर्ताओं ने खतरे के स्तर के आधार पर झीलों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है। इसमें नौ झीलों को अति उच्च जोखिम, 18 को उच्च जोखिम और 26 झीलों को मध्यम जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। यानी हिमाचल के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऐसी कई जलराशियां मौजूद हैं, जिनकी स्थिति में अचानक बदलाव आने पर नीचे की घाटियों में बसे क्षेत्रों को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

 

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पंडोह और भाखड़ा तक पहुंच सकता है हजारों क्यूबिक पानी

अध्ययन में ब्यास और सतलुज नदी बेसिन की दो उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों को लेकर हाइड्रोलॉजिकल और हाइड्रोडायनामिक सिमुलेशन भी तैयार किए गए हैं। प्रोबेबल मैक्सिमम फ्लड यानी PMF जैसी अत्यधिक बाढ़ की स्थिति में ब्यास बेसिन में पंडोह बांध तक अधिकतम जलप्रवाह करीब 17,086 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड और सतलुज बेसिन में भाखड़ा बांध तक करीब 23,478 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।

680 से ज्यादा ढांचों पर मंडरा सकता है खतरा

शोध के अनुसार सबसे खराब स्थिति में ब्यास और सतलुज नदी बेसिन में 680 से अधिक ढांचे संभावित नुकसान के दायरे में आ सकते हैं। इनमें जलविद्युत परियोजनाओं के साथ-साथ अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और नदी के बहाव क्षेत्र में मौजूद संरचनाएं शामिल हैं। ऐसी घटना सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगी। हिमाचल की नदियां राज्य से बाहर तक बहती हैं। इसलिए किसी बड़े GLOF की स्थिति में इसका असर हिमाचल से आगे के मैदानी क्षेत्रों तक पहुंचने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

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हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों के फटने की घटनाएं अब वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं। हिमाचल की भौगोलिक स्थिति, ऊंचे पहाड़ों, सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र, बड़ी संख्या में जलविद्युत परियोजनाओं और तेजी से बदलते मौसम को देखते हुए यहां किसी बड़े GLOF का असर बेहद व्यापक हो सकता है।

अब चेतावनी प्रणाली मजबूत करने का समय

शोध के निष्कर्ष साफ संकेत देते हैं कि खतरा भविष्य की बात मानकर टाला नहीं जा सकता। उच्च जोखिम वाली झीलों की नियमित निगरानी, उनके जलस्तर और आकार में होने वाले बदलावों की रियल टाइम जानकारी, प्राकृतिक बांधों की संरचनात्मक स्थिति का आकलन और संभावित GLOF के लिए शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करना जरूरी है।

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