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August 27, 2026
हिमाचल : लिव-इन से मां-बाप को थी परेशानी, कोर्ट पहुंचा कपल; HC ने कहा- अपनी मर्जी से जियो
इसी साल जनवरी से लिव-इन में रह रहा था कपल
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शिमला। प्यार और रिश्तों को लेकर परिवार की सहमति हमेशा जरूरी हो, ऐसा नहीं है। अगर लड़का और लड़की दोनों कानूनन बालिग हैं, तो अपनी जिंदगी और रिश्ते को लेकर फैसला करने का अधिकार भी उन्हें है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में युवा जोड़े के पक्ष में अहम फैसला सुनाते हुए उन्हें अपनी मर्जी से साथ रहने की अनुमति दी है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जीएस संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने युवती की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने साफ किया कि दोनों बालिग हैं और अपनी इच्छा से साथ रहना चाहते हैं, तो पुलिस या प्रशासन उनके रास्ते में बाधा नहीं डाल सकते।
याचिका में बताया गया कि युवक और युवती जनवरी 2026 से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे। दोनों अलग-अलग कंपनियों में नौकरी करते हैं और करीब 21 वर्ष की उम्र के हैं।
हालांकि, युवक के माता-पिता इस रिश्ते से खुश नहीं थे। याचिका में आरोप लगाया गया कि माता-पिता युवक को जबरन कांगड़ा स्थित घर ले गए और उसकी इच्छा के खिलाफ वहां रखा। युवक के साथ मारपीट और गाली-गलौज किए जाने के आरोप भी लगाए गए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस को युवक को अदालत के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने युवक के माता-पिता से भी बातचीत की और पूरे मामले को समझने की कोशिश की। इसके बाद अदालत ने युवक और युवती को आपस में खुलकर बातचीत करने तथा अपने भविष्य को लेकर फैसला लेने के लिए पर्याप्त समय दिया।
सुनवाई के दौरान युवक के माता-पिता ने अदालत के सामने कहा कि अब उन्हें दोनों के रिश्ते से कोई सीधी आपत्ति नहीं है। हालांकि, उनकी चिंता यह थी कि युवक अभी पढ़ाई कर रहा है और रिश्ते में आगे बढ़ने के कारण उसकी शिक्षा प्रभावित हो सकती है।
अदालत ने भी इस पहलू को गंभीरता से लिया और दोनों युवाओं की काउंसलिंग की। उन्हें अपने रिश्ते के साथ-साथ पढ़ाई और भविष्य को लेकर भी जिम्मेदारी से फैसला लेने की सलाह दी गई।
कोर्ट ने पाया कि युवक और युवती दोनों करीब 21 वर्ष के हैं और कानून की नजर में बालिग हैं। सुनवाई के दौरान दोनों ने स्पष्ट रूप से एक-दूसरे के साथ रहने और अपने रिश्ते को आगे बढ़ाने की इच्छा जाहिर की। यही बात इस मामले में निर्णायक रही। अदालत ने दोनों की इच्छा और उनके बालिग होने को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपनी मर्जी से साथ रहने की अनुमति दे दी।
हाईकोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए पुलिस और प्रशासन को निर्देश दिया कि दोनों के साथ रहने में किसी तरह की बाधा न डाली जाए। इस फैसले के साथ अदालत ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति अपने जीवन और रिश्तों को लेकर खुद निर्णय लेने के हकदार हैं। परिवार की असहमति या सामाजिक दबाव अपने आप में किसी बालिग युवक-युवती को उनकी इच्छा के विरुद्ध अलग रखने का आधार नहीं बन सकता।