#विविध
August 25, 2026
हिमाचल में भांग उगाने का रास्ता साफ : नियमों में हुए बड़े बदलाव, सरकार ने घटाई फीस
फसल कौन खरीदेगा, यह पहले ही होगा तय
शेयर करें:

शिमला। हिमाचल में जिस खेती को लेकर अब तक कानूनी पाबंदियों और ऊंची लाइसेंस फीस की वजह से कदम आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। उसके लिए सरकार ने नियमों का रास्ता थोड़ा आसान कर दिया है। औषधीय और वैज्ञानिक इस्तेमाल के लिए नियंत्रित तरीके से होने वाली भांग की खेती को बढ़ावा देने के लिए लाइसेंस शुल्क में बड़ी कटौती की गई है।
अब खेती शुरू करने वाले आवेदक को पहले के मुकाबले काफी कम शुल्क देना होगा। साथ ही सरकार ने फसल बेचने से लेकर बीज की गुणवत्ता और खेत की निगरानी तक कई शर्तें भी तय कर दी हैं।
राज्य कर एवं आबकारी विभाग की ओर से अधिसूचित दूसरे संशोधन नियम 2026 के तहत भांग की नियंत्रित खेती के लाइसेंस शुल्क में बदलाव किया गया है। पहले जहां एक बीघा के लिए तीन लाख रुपये शुल्क निर्धारित था, उसे घटाकर अब एक लाख रुपये प्रति बीघा कर दिया गया है।
इसी तरह भांग के प्रसंस्करण और विनिर्माण से जुड़ी इकाइयों के लिए सालाना लाइसेंस फीस भी कम की गई है। पहले यह शुल्क दो करोड़ रुपये था, जिसे घटाकर अब एक करोड़ रुपये कर दिया गया है। सरकार के इस कदम का उद्देश्य इस क्षेत्र में किसानों और संभावित निवेशकों की रुचि बढ़ाना माना जा रहा है।
संशोधित नियमों में सिर्फ फीस कम नहीं की गई है, बल्कि खेती शुरू करने की पात्रता भी स्पष्ट की गई है। व्यावसायिक स्तर पर भांग की खेती के लिए कम से कम पांच बीघा का एकीकृत भू-क्षेत्र होना जरूरी होगा।
यानी छोटे-छोटे अलग-अलग खेतों को जोड़कर बिखरे हुए क्षेत्र के बजाय निर्धारित न्यूनतम क्षेत्र में खेती करनी होगी। इसके अलावा लाइसेंस लेने से पहले किसान को किसी अधिकृत निर्माता या कंपनी के साथ बाय-बैक एग्रीमेंट करना होगा।
इसका मतलब है कि खेती शुरू होने से पहले ही फसल के संभावित खरीदार की व्यवस्था तय करनी होगी। इससे किसानों को उत्पादन के बाद बाजार तलाशने की परेशानी कम हो सकती है।
बाय-बैक समझौते की शर्त इस पूरी व्यवस्था का अहम हिस्सा है। किसान अपनी मर्जी से तैयार फसल को खुले बाजार में बेच नहीं सकेगा, बल्कि अधिकृत कंपनी या निर्माता के साथ तय व्यवस्था के तहत ही उत्पाद की बिक्री होगी। सरकार की ओर से यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है- क्योंकि इससे खेती को नियंत्रित रखने के साथ किसानों को बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश की गई है।
भांग की खेती को लेकर सरकार ने निगरानी व्यवस्था भी सख्त रखी है। कृषि विकास अधिकारी या उससे ऊपर के स्तर के अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाया जाएगा। यही अधिकारी खेती से संबंधित गतिविधियों पर नजर रखेंगे।
खेती में इस्तेमाल होने वाले बीजों की गुणवत्ता को लेकर भी नियम तय किए गए हैं। बीज आपूर्तिकर्ता को अधिकृत प्रयोगशाला से जारी गुणवत्ता प्रमाणपत्र देना होगा।
किसान को खेती शुरू करने से कम से कम 21 दिन पहले इस्तेमाल किए जाने वाले बीज और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी संबंधित नोडल अधिकारी को देनी होगी।
संशोधित शुल्क व्यवस्था में अलग-अलग गतिविधियों के लिए भी रकम निर्धारित की गई है। अधिकृत बीज विक्रेता को लाइसेंस के लिए 25 हजार रुपये देने होंगे और नवीनीकरण के लिए भी इतनी ही राशि रखी गई है।
भांग के भंडारण के लिए लाइसेंस शुल्क 10 हजार रुपये होगा। वहीं अनुसंधान और विश्लेषणात्मक परीक्षण से संबंधित लाइसेंस के लिए एक लाख रुपये शुल्क निर्धारित किया गया है। चिकित्सीय और वैज्ञानिक इस्तेमाल के लिए तैयार उत्पाद को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए ट्रांसपोर्ट परमिट लेना होगा, जिसके लिए दो हजार रुपये शुल्क तय किया गया है।
नियमों में एक और महत्वपूर्ण बदलाव औद्योगिक इस्तेमाल के लिए भांग की खेती से जुड़ा है। पहले ऐसी खेती के लिए अधिसूचित क्षेत्रों की व्यवस्था थी, लेकिन अब पूरे हिमाचल को संभावित क्षेत्र के तौर पर देखने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है।
सरकार की योजना का फोकस भांग को नशीले पदार्थ के रूप में बढ़ावा देना नहीं, बल्कि इसके नियंत्रित औषधीय और वैज्ञानिक उपयोग से जुड़े क्षेत्र को विकसित करना है। इसी वजह से खेती, बीज, खरीद, भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन-हर स्तर पर लाइसेंस और निगरानी की व्यवस्था रखी गई है।
सरकार को उम्मीद है कि नियंत्रित खेती की अनुमति और शुल्क में कटौती से औषधीय उत्पादों के अलावा कॉस्मेटिक्स, टेक्सटाइल और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भी संभावनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, इस पूरी व्यवस्था का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि नए शुल्क और नियमों के बाद किसान और उद्योग इस क्षेत्र में कितनी रुचि दिखाते हैं।