सिरमौर। हिमाचल प्रदेश की ऊंची चोटियों में बसे प्रसिद्ध आस्था केंद्र चूड़धार मंदिर के कपाट बैसाखी व संक्रांति के पावन अवसर पर विधिवत रूप से श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं। मंदिर के द्वार खुलते ही पूरे क्षेत्र में एक बार फिर धार्मिक गतिविधियों की रौनक लौट आई है।

बैसाखी पर खुले चूड़धार मंदिर के कपाट

करीब चार महीनों तक कड़ाके की ठंड और भारी बर्फबारी के कारण बंद थे। आज सुबह कपाट खुलते ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई। पारंपरिक रीति-रिवाजों, वैदिक मंत्रोच्चार और विशेष पूजा-अर्चना के साथ कपाट खोलने की प्रक्रिया पूरी की गई।

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जयकारों से पूरा चूड़धार क्षेत्र गूंज उठा

इस दौरान स्थानीय ग्रामीणों और मंदिर समिति के सदस्यों ने मिलकर पूरे परिसर को सजाया और श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए विशेष इंतजाम किए। जैसे ही कपाट खुले, “जय श्री शिरगुल महाराज” के जयकारों से पूरा चूड़धार क्षेत्र गूंज उठा और वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।

 

12 हजार फीट की ऊंचाई पर

करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह पवित्र धाम हिमाचल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। हर साल सर्दियों में यहां भारी हिमपात होता है, जिससे मंदिर तक पहुंचना असंभव हो जाता है।

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चार महीने से इंतजार कर रहे थे भक्त

इसी कारण परंपरा के अनुसार शीतकाल में कपाट बंद कर दिए जाते हैं और मौसम के अनुकूल होते ही दोबारा खोल दिए जाते हैं। इस बार भी जैसे ही मौसम ने करवट ली, श्रद्धालुओं के लिए दर्शन के द्वार खोल दिए गए।

 

क्या है मंदिर की मान्यता?

माना जाता है कि यह स्थान भगवान शिरगुल महाराज की तपोस्थली है, जहां दूर-दूर से लोग अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुंचते हैं। कपाट खुलने के साथ ही चूड़धार धाम एक बार फिर आस्था, श्रद्धा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम बन गया है, जहां आने वाले दिनों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है।

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सावधानी बरतने की सलाह

मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे यात्रा पर निकलने से पहले मौसम की स्थिति की जानकारी जरूर लें। ऊंचाई वाले इस क्षेत्र में अभी भी ठंड का असर बना हुआ है, ऐसे में गर्म कपड़े, जरूरी दवाइयां और अन्य आवश्यक सामान साथ रखना बेहद जरूरी है। साथ ही यात्रा के दौरान सावधानी बरतने की भी सलाह दी गई है।

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