#अव्यवस्था
April 14, 2026
हिमाचल में बुरे हाल : खाली पड़े सरकारी क्वार्टर में आया 2.88 करोड़ पानी बिल, हिसाब में फंसा विभाग
खाली सरकारी आवासों में बहता रहा पानी
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में सरकारी आवासों से जुड़े पानी के बिलों का मामला अब प्रशासनिक उलझनों में फंसता नजर आ रहा है। जल शक्ति विभाग हिमाचल प्रदेश के सामने एक बड़ा वित्तीय संकट खड़ा हो गया है- जहां पानी के बिल वर्षों से लंबित पड़े हैं।
जल आपूर्ति से जुड़े दो प्रमुख संस्थान- जल शक्ति विभाग और शिमला जल प्रबंधन निगम लिमिटेड ने प्रदेश भर के 1988 सरकारी आवासों के लिए करीब 2.88 करोड़ रुपये के पानी के बिल जारी किए हैं। मगर इनकी अदायगी को लेकर स्थिति अब तक साफ नहीं हो पाई है।
दरअसल, ये सभी बिल उन सरकारी आवासों से जुड़े हैं जो किसी कारणवश खाली पड़े रहे और जिनका समय पर पुनः आवंटन नहीं हो सका। आवासों के लंबे समय तक खाली रहने के कारण पानी के मीटर के आधार पर लगातार बिल बनते रहे, जिससे कुल बकाया राशि बढ़कर करोड़ों में पहुंच गई।
अब सवाल यह उठ रहा है कि इन खाली आवासों के दौरान बने बिलों का भुगतान आखिर कौन करेगा- संबंधित विभाग, आवास आवंटन प्राधिकरण या फिर राज्य सरकार खुद।
जानकारी के अनुसार, यह पूरा मामला वित्तीय वर्ष 2025-26 से जुड़ा हुआ है, जबकि नया वित्तीय वर्ष शुरू हो चुका है। ऐसे में यह एक तकनीकी और वित्तीय पेच बन गया है, जिस पर अंतिम निर्णय राज्य सरकार को लेना है। इसी को देखते हुए जल शक्ति विभाग ने पूरी फाइल सरकार को भेज दी है, ताकि स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल सकें।
अधिकारियों का कहना है कि सभी सरकारी आवासों में पानी के मीटर लगे हुए हैं और बिलिंग पूरी तरह मीटर रीडिंग के आधार पर की जाती है। अब बिलिंग प्रक्रिया को ऑनलाइन भी अपडेट कर दिया गया है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है।
हालांकि, अदायगी न होने के कारण ये सभी बिल सिस्टम में लंबित (पेंडिंग) दिख रहे हैं। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो कुल 1988 मामलों में से 1650 मामले केवल शिमला शहर से जुड़े हैं, जहां जल आपूर्ति की जिम्मेदारी शिमला जल प्रबंधन निगम लिमिटेड के पास है। यहां अकेले लगभग 2 करोड़ 78 लाख 64 हजार 788 रुपये का बिल बकाया है।
वहीं, बाकी 288 सरकारी आवास प्रदेश के अन्य जिलों और उपमंडलों में स्थित हैं, जिन पर करीब 10 लाख 91 हजार 638 रुपये का बकाया है। इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने कहा है कि सरकार जल्द ही इस पर फैसला लेगी। संकेत दिए जा रहे हैं कि विभागीय स्तर पर जिम्मेदारी तय करने या किसी विशेष प्रावधान के तहत इन बिलों के निपटारे का रास्ता निकाला जा सकता है।
फिलहाल, यह मुद्दा न केवल वित्तीय प्रबंधन की चुनौती बन गया है, बल्कि सरकारी संपत्तियों के उपयोग और रखरखाव से जुड़े सिस्टम पर भी सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले दिनों में सरकार का फैसला यह तय करेगा कि करोड़ों रुपये के इस बकाया का बोझ आखिर किसके हिस्से में जाएगा।