कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश में करनैल राणा को कौन नहीं जानता। अनगिनत मंचों पर करनैल राणा ने हिमाचली संस्कृति का नेतृत्व किया है। 1963 में जन्मे राणा लोक गायकी में तो पहचान रखते ही हैं, वो थिएटर के कलाकार भी हैं। आज बात करेंगे हिमाचल की लोक संस्कृति को संजोने वाले करनैल राणा की।
पिता भी थे लोक गायक
राणा का जन्म कांगड़ा जिले की ज्वालामुखी तहसील में रकवाल लाहड़ गांव में 30 अप्रैल 1963 को हुआ। उनके पिता को भी लोक संगीत पसंद था। वे लोक गायन में रूचि रखते थे और खुद भी बढ़िया लोक गायक थे। यही वजह है कि बचपन से ही करनैल राणा को लोक संगीत में रुचि हो गई।
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1994 में आई पहली एलबम
साल 1986 में करनैल राणा ने राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला से स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने राजस्थान के कोटा से पत्रकारिता और जनसंचार में डिग्री प्राप्त की। साल 1994 में करनैल राणा की पहली एल्बम ‘चंबे पतने दो बेडियां’ रिलीज हुई थी। इस एलबम को जबरदस्त सराहना मिली थी।
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1988 में बने कलाकार
करनैल राणा ने 150 से भी ज्यादा एल्बम्स के लिए गाया और एक स्टार लोक गायक के रूप में अपनी पहचान बनाई। उनके टैलेंट को देखकर साल 1988 में राणा को हिमाचल प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में थियेटर यूनिट में एक कलाकार के रूप में नियुक्ति मिली।
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यूट्यूब पर आते हैं गाने
जिला सूचना एवं जन संपर्क अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद करनैल राणा धर्मशाला में बस गए। वो अपने गायन में प्रयोग करते रहते हैं। उनका अपना यूट्यूब चैनल भी है जिसपर समय-समय पर लोकगीत रिलीज किए जाते हैं। हिमाचली गीतों की पहुंच बढ़ाने के लिए राणा ने कमाल का काम किया है।
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करनैल राणा के प्रसिद्ध गाने
1. फौजी मुंडा आई गेया छुट्टी
2. दो नारां
3. डाडे दी ये बेडिये,
4. बिंदु नीलू दो सखियां
5. होरना पतनां
6. ओ नौकरा अंब पाके ओ घर आ
7. निंद्रे पारे-पारे चली जायां
8. धूड़ू नचया जटा ओ खलारी हो
9. हुण ओ कतां जो नसदा धुडुआ
10. बिंदु नीलू दो सखियां
