शिमला। हिमाचल प्रदेश की सत्ता पर काबिज कांग्रेस को राजधानी शिमला में ही बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। शिमला जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर भाजपा ने कब्जा जमाकर सुक्खू सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। खास बात यह है कि शिमला जिले में कांग्रेस के सात विधायक और सरकार में तीन मंत्री होने के बावजूद पार्टी जिला परिषद की दोनों महत्वपूर्ण कुर्सियां अपने कब्जे में नहीं रख पाई।

 

करीब 102 दिनों से चल रही राजनीतिक खींचतान के बाद हुए चुनाव में भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा अपने पक्ष में करते हुए कांग्रेस को मात दे दी। अध्यक्ष पद पर भाजपा के भूपेंद्र सिंह सिसोदिया और उपाध्यक्ष पद पर भरत सिंह कलांटा विजयी रहे।

सत्ता कांग्रेस की, शिमला में सात विधायक और तीन मंत्री

शिमला जिला परिषद का चुनाव कांग्रेस के लिए इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि जिले की राजनीतिक तस्वीर फिलहाल कांग्रेस के पक्ष में है। शिमला जिले की आठ विधानसभा सीटों में से सात पर कांग्रेस के विधायक हैं, जबकि केवल चौपाल विधानसभा क्षेत्र भाजपा के पास है।

 

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इसके अलावा मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के मंत्रिमंडल में शिमला जिले से रोहित ठाकुर, अनिरुद्ध सिंह और विक्रमादित्य सिंह जैसे तीन मंत्री शामिल हैं। राजधानी में नगर निगम पर भी कांग्रेस का कब्जा है। ऐसे राजनीतिक समीकरणों के बावजूद जिला परिषद की सत्ता भाजपा के हाथ में जाना कांग्रेस संगठन और सरकार दोनों के लिए गंभीर राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

11 सदस्यों के साथ भाजपा ने बदला पूरा समीकरण

25 सदस्यीय जिला परिषद में भाजपा के पास अपने दम पर बहुमत नहीं था। भाजपा के 11 सदस्य होने के बावजूद पार्टी ने निर्दलीय सदस्यों का समर्थन जुटाकर सत्ता का समीकरण अपने पक्ष में कर लिया।

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अध्यक्ष पद के चुनाव में भाजपा उम्मीदवार भूपेंद्र को 13 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को 10 मत प्राप्त हुए। दो मत रद्द हुए। इस तरह भाजपा ने एक वोट के अंतर से अध्यक्ष पद पर कब्जा कर लिया। वहीं उपाध्यक्ष पद पर भाजपा के भरत सिंह कलांटा को 14 मत मिले। कांग्रेस उम्मीदवार को 10 वोट मिले और एक मत रद्द हुआ। इस तरह उपाध्यक्ष पद भी भाजपा के खाते में चला गया।

 

करीब 26 साल बाद भाजपा की जिला परिषद में वापसी

शिमला जिला परिषद की राजनीति में भाजपा की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि करीब 26 साल बाद भाजपा ने जिला परिषद की सत्ता पर कब्जा जमाया है। ऐसे में पार्टी इसे केवल स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक माहौल के संकेत के तौर पर पेश कर रही है।

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कांग्रेस के लिए चिंता की बात यह है कि यह नतीजा ऐसे समय आया है जब प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब करीब 15 महीने का समय ही बचा है। हालांकि जिला परिषद के परिणाम को सीधे विधानसभा चुनाव का पैमाना नहीं माना जा सकता, लेकिन राजधानी में सत्ता पक्ष के प्रभाव के बावजूद भाजपा की जीत ने राजनीतिक चर्चाओं को जरूर तेज कर दिया है।

सुक्खू सरकार के लिए क्यों अहम है यह हार?

शिमला जिला मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार के लिए राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। राजधानी में सरकार और संगठन की मजबूत मौजूदगी के बावजूद जिला परिषद की कुर्सी हाथ से निकलना कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का विषय बन सकता है। राजनीतिक तौर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि जब जिले में कांग्रेस के सात विधायक, तीन मंत्री और राजधानी में नगर निगम की सत्ता पार्टी के पास है, तो जिला परिषद के 25 सदस्यों के बीच पार्टी अपना बहुमत क्यों नहीं जुटा सकी?

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भाजपा ने निर्दलीयों के सहारे कांग्रेस को दिया झटका

इस चुनाव ने एक और बात साफ कर दी कि स्थानीय निकायों की राजनीति में निर्दलीय सदस्य निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा के पास 11 सदस्य होने के बावजूद निर्दलीयों का समर्थन उसके लिए गेमचेंजर साबित हुआ। यही कारण है कि भाजपा ने कांग्रेस के मजबूत राजनीतिक प्रभाव वाले जिले में न केवल अपना अध्यक्ष बनाया, बल्कि उपाध्यक्ष की कुर्सी भी अपने नाम कर ली।

जयराम ठाकुर बोले- यह लोकतंत्र की जीत

शिमला जिला परिषद में भाजपा की जीत के बाद नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने भूपेंद्र सिंह सिसोदिया और भरत सिंह कलांटा को बधाई दी। उन्होंने इसे लोकतंत्र की जीत बताते हुए प्रदेश सरकार पर सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगाया। जयराम ठाकुर ने कहा कि जनादेश को प्रभावित करने के प्रयास किए गए, लेकिन जनप्रतिनिधियों ने इसका जवाब देते हुए भाजपा प्रत्याशियों के पक्ष में मतदान किया। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से इस परिणाम से सबक लेने और लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा जनादेश का सम्मान करने की बात कही।

 

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विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी?

शिमला जिला परिषद का यह परिणाम भले ही विधानसभा चुनाव का सीधा संकेत न हो, लेकिन कांग्रेस के लिए इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। सत्ता में कांग्रेस, जिले में सात विधायक और तीन मंत्री—फिर भी जिला परिषद की दोनों कुर्सियां भाजपा के खाते में जाना पार्टी के लिए राजनीतिक मंथन का विषय बन गया है।

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वहीं भाजपा इस जीत को आने वाले समय में कांग्रेस सरकार के खिलाफ अपने राजनीतिक अभियान को धार देने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। विधानसभा चुनाव से करीब 15 महीने पहले राजधानी शिमला में मिली यह जीत भाजपा के लिए मनोबल बढ़ाने वाली है, जबकि कांग्रेस के लिए संगठनात्मक रणनीति और जमीनी पकड़ की समीक्षा का संकेत मानी जा रही है।

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