शिमला। हिमाचल प्रदेश अपनी मेहमाननवाजी की परंपरा के लिए जाना जाता है, लेकिन यही परंपरा अब सियासी बहस का कारण बन गई है। एक ओर राज्य आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, तो दूसरी ओर बीते तीन वर्षों में वीवीआईपी मेहमानों की आवभगत पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं। विधानसभा के बजट सत्र में सामने आए आंकड़ों ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

तीन साल में 6.5 करोड़ से ज्यादा खर्च

सरकार द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार पिछले तीन वर्षों में 426 वीवीआईपी को हिमाचल में स्टेट गेस्ट का दर्जा दिया गया। इनके ठहरने, खाने.पीने और यात्रा पर कुल मिलाकर साढ़े छह करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए। इसमें लगभग 4.86 करोड़ रुपये आतिथ्य व्यवस्था पर और 1.65 करोड़ रुपये परिवहन सुविधाओं पर खर्च हुए।

 

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आर्थिक चुनौतियों के बीच बढ़ा खर्च

राज्य में रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट को लेकर बहस जारी है, लेकिन इसी बीच सामने आए इन आंकड़ों ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि आर्थिक दबाव के बावजूद वीवीआईपी मेहमाननवाजी पर इतना बड़ा खर्च क्यों किया गया। हालांकि सरकार का तर्क है कि यह खर्च परंपरा और प्रोटोकॉल के तहत किया जाता है।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के दौरों पर बड़ा खर्च

खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा राष्ट्रपति के दौरों पर हुआ, जहां एक-एक दौरे पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हिमाचल दौरों के दौरान भी लाखों रुपये होटल, भोजन और परिवहन व्यवस्था पर खर्च किए गए। उनके स्टाफ और सुरक्षा एजेंसियों की व्यवस्थाएं भी इसी मद में शामिल हैं।

राजनीतिक नेताओं और मेहमानों की लंबी सूची

स्टेट गेस्ट की सूची में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के कई बड़े नेता शामिल रहे। प्रियंका गांधी वाड्रा के स्टाफ को भी शिमला में ठहराने की व्यवस्था सरकारी खर्च पर की गई। इसके अलावा अशोक गहलोत, आनंद शर्मा, डीके शिवकुमार, भूपेंद्र हुड्डा और भूपेश बघेल जैसे नेताओं के दौरों पर भी लाखों रुपये खर्च हुए।

 

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न्यायपालिका और विदेशी मेहमान भी शामिल

सिर्फ राजनीतिक हस्तियां ही नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को भी स्टेट गेस्ट का दर्जा दिया गया। इसके अलावा कई देशों के राजदूतों के हिमाचल दौरे पर भी सरकारी खजाने से खर्च किया गया।

कुछ मेहमानों ने खुद उठाया खर्च

दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि कुछ वीवीआईपी मेहमानों ने अपनी यात्रा और ठहरने का खर्च स्वयं उठाया। इनमें सेना प्रमुख और सीडीएस जैसे उच्च पदस्थ अधिकारी शामिल रहे, जिन्होंने सरकारी सुविधा लेने से परहेज किया।

 

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विधानसभा में उठा मुद्दा, सरकार ने दिया जवाब

यह मामला विधानसभा के बजट सत्र में उस समय उठा जब विपक्षी विधायक ने तीन वर्षों में स्टेट गेस्ट पर हुए खर्च का ब्योरा मांगा। जवाब में सरकार ने विस्तृत आंकड़े पेश किए और स्पष्ट किया कि सभी खर्च निर्धारित नियमों और प्रोटोकॉल के तहत किए गए हैं।

परंपरा बनाम खर्च, बहस जारी

हिमाचल की संस्कृति में “अतिथि देवो भव” की भावना गहराई से जुड़ी है, और सरकार भी उसी परंपरा को निभा रही है। लेकिन करोड़ों के इस खर्च ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या आर्थिक चुनौतियों के दौर में इस पर पुनर्विचार की जरूरत है।

 

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