शिमला। हिमाचल प्रदेश में इस वक्त का हॉट टॉपिक है पंचायती राज व शहरी निकाय चुनाव। कोई नहीं जानता कब ये चुनाव होंगे। काफी समय से सरकार, प्रशासन, निर्वाचन आयोग की ओर से अलग-अलग बयान सुनने को मिल रहे हैं। ऐसे में ये विवाद गहराता जा रहा है।

उपायुक्तों से मांगा गया था स्पष्टीकरण

राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव प्रक्रिया में देरी पर उपायुक्तों के काम पर नाराजगी जाताई थी व स्पष्टीकरण मांगा था। कुछ ने कहा कि डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट लागू होने की वजह से चुनाव कार्य नहीं कर पाए। 

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आयोग ने पूछा- कब खत्म होगा एक्ट ?

उपायुक्तों के इस जवाब के बाद राज्य निर्वाचन आयुक्त अनिल खाची ने मुख्य सचिव संजय गुप्ता को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने पूछा कि राज्य में बारिश का दौर खत्म हो चुका है। ऐसे में डिजास्टर एक्ट कब खत्म होगा ?

राज्यपाल को प्रस्तुत की जाएगी रिपोर्ट

अब मुख्य सचिव के उत्तर के बाद ही इस मामले में आगे की कार्रवाई की जाएगी। राज्य निर्वाचन आयोग पंचयात और शहरी निकाय चुनाव की तैयारियों से संबंधित रिपोर्ट राज्यपाल को प्रस्तुत करेगा। 

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बैठक में उपस्थित नहीं हुए अधिकारी

राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव तैयारियों को लेकर सचिव स्तर के अधिकारियों की बैठक बुलाई थी। बैठक में अधिकारी अनुपस्थित रहे। निर्वाचन आयोग ने उपायुक्तों को चुनावी सामग्री और बैलेट पेपर उठाने के निर्देश दिए थे लेकिन ये नहीं उठाई गई।

लगभग 55 सड़कें बताई गई थीं बंद

वहीं प्राकृतिक आपदा के चलते सड़कों के बंद होने का तर्क दिया गया है। ऐसे में आयोग ने जिलों से इसकी रिपोर्ट मांगी। पूछा गया कि जिले में कितनी सड़कें बंद हैं। लगभग 55 सड़कें बंद बताई गई थीं।

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मुख्य सड़क कोई भी बंद नहीं- PWD

फिर इसे लेकर लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियंता से अलग से रिपोर्ट मांगी गई। विभाग की ओर से जानकारी मिली कि 55 में से 42 के करीब सड़कें ऐसी हैं जो वैकल्पिक मार्ग से जुड़ी हैं। यानी मुख्य सड़क कोई भी बंद नहीं है।

सरकार द्वारा ली जा रही कानूनी राय

प्रदेश सरकार ने आयोग के फैसले को लेकर अपने स्तर पर मंथन शुरू कर दिया है। इस पर कानूनी राय भी ली जा रही है। आयोग का कहना है कि अगर अब पुनर्गठन व पुनर्सीमांकन किया जाता है तो वोटर लिस्ट नए सिरे से बनानी होगी।

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सिर्फ चुनावों के लिए आपदा का तर्क

सरकार कह रही है कि डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट लागू होने की वजह से पंचायतों व वार्डों का पुनर्गठन नहीं हो पाया था। गौरतलब है कि जो जिले प्राकृतिक आपदा का तर्क दे रहे हैं, वहां शिक्षण संस्थान चल रहे हैं। मेले व अन्य कार्यक्रम भी हो रहे हैं लेकिन चुनाव के लिए आपदा का तर्क दिया जा रहा है।