#राजनीति
May 24, 2026
सेवा का जज्बा या कुर्सी का.... हिमाचल में 97 वर्षीय बुजुर्ग लड़ रहा पंचायत चुनाव; हर तरफ हो रही चर्चा
97 वर्षीय बुजुर्ग लड़ रहे उपप्रधान का चुनाव, नशे के खिलाफ छेड़ना चाहते हैं अभियान
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कांगड़ा। बढ़ती उम्र के साथ जहां अधिकांश लोग आराम और शांत जीवन को प्राथमिकता देने लगते हैं, वहीं देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के एक बुजुर्ग ने अपने हौसले और जज्बे से लोगों को हैरान कर दिया है। आमतौर पर 90 वर्ष की उम्र पार करने के बाद सुनने और देखने की क्षमता कमजोर होने लगती है, कई बुजुर्ग विभिन्न बीमारियों से जूझते हैं।
लेकिन कांगड़ा जिले से सामने आई एक खबर ने साबित कर दिया है कि यदि इरादे मजबूत हों तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है। नगरोटा बगवां विकास खंड की झिकला हटवास पंचायत में युवा उम्मीदवारों के बीच 97 साल के परसराम कामरेड ने चुनावी मैदान में उतर कर सभी को हैरान कर दिया है।
परसराम की उम्र भले ही 97 वर्ष हो चुकी है, लेकिन समाज के लिए कुछ करने का उनका उत्साह आज भी किसी युवा से कम नहीं है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे सक्रिय जीवन जी रहे हैं और पंचायत के विकास को लेकर अपनी स्पष्ट सोच रखते हैं। ग्रामीणों के बीच उनकी पहचान एक जागरूक और सामाजिक सरोकारों से जुड़े व्यक्ति के रूप में है। यही कारण है कि उनके चुनाव मैदान में उतरने की खबर पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है।
97 वर्ष के इस पड़ाव पर आकर भले ही परसराम कामरेड की कमर थोड़ी झुक गई हो और उनके चेहरे की झुर्रियां उनके जीवन के लंबे अनुभवों को बयां करती हों, लेकिन उनके भीतर समाज को बदलने की सोच और जनता की सेवा करने का जज्बा आज के किसी युवा नेता से कम नहीं है।
चुनाव प्रचार के दौरान जब वे गांव की गलियों में निकलते हैं, तो उनके पैरों की रफ्तार और इरादे देखकर विरोधी भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। परसराम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) की विचारधारा से लंबे समय से जुड़े हुए हैं और उनके इसी जुझारू व्यक्तित्व के कारण लोग उन्हें बेहद सम्मान से कामरेड कहकर पुकारते हैं।
परसराम की सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे आज भी बिना चश्मे के अखबार पढ़ लेते हैं। सुनने की क्षमता भी सामान्य है और वे गांव से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय बेबाकी से रखते हैं। इतना ही नहीं, जरूरत पड़ने पर ग्रामीणों की समस्याओं को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों को स्वयं पत्र लिखते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि उम्र के बावजूद उनकी स्मरण शक्ति और सामाजिक मुद्दों पर पकड़ आज भी मजबूत है। यही वजह है कि लोग उन्हें सम्मान और प्रेरणा की दृष्टि से देखते हैं।
जब परसराम से इस उम्र में चुनाव लड़ने का मुख्य कारण पूछा गया, तो उन्होंने बेहद संजीदगी से कहा कि आज नशा हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा कलंक और नासूर बन चुका है। हमारी होनहार युवा पीढ़ी तेजी से नशे की इस जानलेवा गिरफ्त में समाती जा रही है, जो देश और प्रदेश के भविष्य के लिए बेहद घातक है।
उन्होंने कहा कि यही गहरी चिंता उन्हें इस उम्र में घर पर आराम करने के बजाय लोकतंत्र के इस अखाड़े में खींच लाई है। इसके साथ ही, गांव की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने और असामाजिक तत्वों व अपराधियों पर लगाम कसने के लिए वे पंचायत के हर मुख्य मोड़ और गांव में आधुनिक निगरानी कैमरे (सीसीटीवी) लगवाने की दिशा में काम करेंगे।
97 वर्ष की उम्र में चुनाव लड़ने को लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं भी हो रही हैं। कुछ लोग इसे समाज सेवा के प्रति उनका समर्पण बता रहे हैं तो कुछ इसे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने की उनकी अदम्य इच्छा मान रहे हैं। हालांकि अधिकांश लोगों का मानना है कि जिस उम्र में लोग सार्वजनिक गतिविधियों से दूरी बना लेते हैं, उस उम्र में चुनाव लड़ना अपने आप में बड़ी बात है।