शिमला। हिमाचल प्रदेश की लाइफलाइन कही जाने वाली HRTC की बसों का किराया बढ़ाना राज्य की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार के लिए लोकप्रिय कदम नहीं है। इसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम होंगे और इस साल के आखिर में होने वाले पंचायत चुनाव में इसके नतीजे देखने को मिलेंगे। लेकिन, भीषण आर्थिक संकट झेल रही सुख सरकार ने अनचाहे ही सही, लेकिन खस्ताहाल HRTC को घाटे से उबारने के लिए बसों के किराए में 20 फीसदी तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव तो तैयार किया है, लेकिन इससे भी वह HRTC को घाटे से नहीं उबार पाएगी। 

कारण नंबर 1: प्रति किमी हो रहा है नुकसान 

इसकी सबसे खास वजह यह है कि HRTC की डीजल बसों के प्रति किमी परिचालन से निगम को 70 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। इसमें ड्राइवर-कंडक्टर  की सैलरी का प्रति किमी खर्च 27 और 29 रुपए है। HRTC को प्रति किमी 10 रुपए का खर्च बसों के लोन रीपेमेंट में आता है। बसों के मेंटेनेंस और अन्य के लिए प्रति किमी 4 से 5 रुपए का खर्च आता है। 

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कारण नंबर 2: आमदनी अठन्नी, खर्च रुपया 

HRTC फिलहाल प्रति किमी 40 से 42 रुपए की कमाई कर रहा है। इसका मतलब है कि HRTC की बसों के परिचालन खर्च की तुलना में कमाई लगभग आधी है। उसे प्रति किलोमीटर करीब 25 रुपए का घाटा हो रहा है। 

कारण नंबर 3: डीजल पीती बसें 

HRTC की 3358 बसों में से 69 बसें डीजल पीती हैं, क्योंकि ये 15 साल से पुरानी होकर कंडम हो चुकी हैं। अब HRTC ने 700 नई बसें खरीदने को मंजूरी दी है। इनमें 97 इलेक्ट्रिक बसें, 250 डीजल बसें, 24 सुपर एसी लग्जरी बसें, 100 टेंपो ट्रैवलर शामिल हैं। केंद्र सरकार ने 15 साल से ज्यादा पुरानी डीजल बसों को हटाने को कहा है। इन कंडम बसों के कारण HRTC को नुकसान उठाना पड़ रहा है। 

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कारण नंबर 4: ई-बसों पर ज्यादा भरोसा 

हिमाचल प्रदेश के टेढ़े-मेढ़े पहाड़ी रास्तों पर ई-बसें कम दूरी के लिए तो प्रभावी हैं, लेकिन लागत जुटाने के मामले में फिसड्डी साबित होती हैं। ऐसे में इन बसों की खरीद के लिए लंबी अवधि का लोन लेना पड़ता है। अब सरकार ने HRTC की बसों का न्यूनतम किराया 5 से 10 रुपए कर दिया है, जो ई-बसों के प्रति किमी संचालन व्यय यानी 25 रुपए को देखते हुए बहुत ज्यादा है। लेकिन सरकार चाहती है कि ई-बसों का लोन अधिकतम 5 साल से रिकवर हो जाए, ताकि नई बसें खरीदी जा सकें। हालांकि, लंबी दूरी तक चलने वाली डीजल बसें ई-बसों के मुकाबले अपनी लागत जल्दी निकाल लेती हैं। 

कारण नंबर 5: ओवरहेड कॉस्ट अधिक 

HRTC का अेवरहेड कॉस्ट अधिक है। कर्मचारियों के वेतन पर हर माह 45 करोड़, पेंशन पर 25, डीजल पर 45 करोड़, भत्तों पर 55 करोड़ और ओवरटाइम पर 97 करोड़ रुपए का बोझ आता है। इस तरह HRTC को हर माह 267 करोड़ रुपए ओवरहेड के लिए खर्च करने पड़ रहे हैं। हिमाचल सरकार अभी तक सातवां वेतनमान ही पूरी तरह से लागू नहीं कर पाई है। अगले साल, यानी 2026 से आठवां वेतनमान लागू हो जाएगा। 

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2024 में 514 करोड़ रुपए की कमाई कर चुकी HRTC का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सैलरी, पेंशन और भत्तों में खर्च हो रहा है। अगले साल HRTC की हालत और खस्ता हो जाएगी। देखना यह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सुक्खू सरकार क्या फिर HRTC के किराए में बढ़ोतरी करने की हिम्मत कर पाएगी?

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