शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार इन दिनों गहरे आर्थिक संकट से गुजर रही है। केंद्र सरकार से मिलने वाले राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grant) बंद होने के बाद राज्य की वित्तीय स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण हो गई है। इसी दबाव को देखते हुए मुख्यमंत्री ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अपने सलाहकारों और बोर्ड-निगमों के उपाध्यक्षों से कैबिनेट रैंक वापस ले लिए हैं। इसके अलावा अगले 6 महीनों के लिए इनके वेतन में 20 फीसदी की कटौती भी लागू कर दी है।
क्यों लेना पड़ा ये कड़ा फैसला ?
मुख्यमंत्री सुक्खू के अनुसार केंद्र से मिलने वाली ग्रांट बंद होने के कारण राज्य को सालाना करीब 8,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। सरकार का लक्ष्य फिजूलखर्ची रोककर प्रशासनिक सुधार करना है। हालांकि CM ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे जनहित के क्षेत्रों के बजट में कोई कटौती नहीं की जाएगी।
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कैबिनेट का दर्जा गंवाने वाले प्रमुख नाम
इन नेताओं से विशेष सुविधाएं और दर्जा वापस लिया गया है जिनसे सरकारी खजाने पर सालाना लगभग 90 लाख रुपये का बोझ पड़ रहा था:
- रघुवीर सिंह बाली (कांगड़ा): नगरोटा बगवां से विधायक व पर्यटन निगम के अध्यक्ष। इनके पिता स्व. जीएस बाली प्रदेश के दिग्गज नेता थे।
- भवानी सिंह पठानिया (कांगड़ा): फतेहपुर के विधायक और राज्य योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष। ये पूर्व मंत्री सुजान सिंह पठानिया के पुत्र हैं।
- केहर सिंह खाची (शिमला): वन निगम के उपाध्यक्ष। खाची गांधी परिवार के करीबी माने जाते हैं। प्रियंका गांधी के शिमला स्थित घर की पावर ऑफ अटॉर्नी भी इन्हीं के पास थी।
- नंद लाल (शिमला): रामपुर के विधायक व सातवें वित्त आयोग के अध्यक्ष। 2024 के राज्यसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक समीकरण साधने हेतु इन्हें कैबिनेट रैंक दिया गया था।
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सलाहकारों पर भी गिरी गाज
नेताओं के साथ-साथ CM के करीबियों पर भी इस फैसले का असर पड़ा है:
- सुनील बिट्टू: मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार और हमीरपुर के कद्दावर नेता।
- नरेश चौहान: मीडिया सलाहकार व CM के कॉलेज मित्र। उन्होंने सरकार के इस फैसले का समर्थन करते हुए इसे जरूरी कदम बताया है।
- गोकुल बुटेल: आईटी सलाहकार। रोचक बात यह है कि बुटेल पहले से ही केवल 1 रुपये वेतन ले रहे थे, फिर भी प्रशासनिक सुधार के तहत उनसे कैबिनेट रैंक वापस ली गई है।
- अनिल कपिल: इन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर सलाहकार बनाया गया था, जिनका दर्जा भी अब कम हो गया है।
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हिमाचल सरकार के इस कदम को एक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि वित्तीय संकट के समय सत्ता के गलियारों से ही बचत की शुरुआत की जा रही है। मुख्यमंत्री ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में आर्थिक मजबूती के लिए कुछ और कठोर निर्णय लिए जा सकते हैं।
