#राजनीति

April 26, 2026

हिमाचल की इस पंचायत में नहीं होंगे चुनाव : पैनल चुनने के लिए खेला जाएगा लक्की ड्रॉ

अपने नाम की पर्चियां डालते हैं उम्मीदवार- निर्विरोध होता है चयन

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HIMACHAL PANCHAYAT ELECTIONS

सिरमौर। हिमाचल प्रदेश में जहां आमतौर पर पंचायत चुनावों में खींचतान, गुटबाजी और भारी खर्च देखने को मिलता है। वहीं, सिरमौर जिले के शिलाई विधानसभा क्षेत्र की टटियाना पंचायत एक बार फिर अलग मिसाल पेश करने की तैयारी में है।

चुनाव का मतलब मुकाबला नहीं

यहां चुनाव का मतलब मुकाबला नहीं, बल्कि सहमति और सामूहिक निर्णय बन चुका है। पिछले चुनाव की तरह इस बार भी पंचायत का पूरा पैनल निर्विरोध चुनने की दिशा में गांव आगे बढ़ रहा है।

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उम्मीदवार डालते हैं पर्चियां

ग्रामीणों के अनुसार, पंचायत के अहम पद प्रधान, उपप्रधान, BDC और वार्ड सदस्यचार प्रमुख बेड़ों (खानदानों) के बीच पहले से तय व्यवस्था के तहत बांटे जाते हैं। जिस बेड़े की जिस पद पर बारी होती है, उसी परिवार समूह के इच्छुक उम्मीदवार अपने नाम की पर्चियां डालते हैं।

लक्की ड्रॉ से होगा चयन

इसके बाद गांव की समिति की मौजूदगी में ‘लक्की ड्रॉ’ निकाला जाता है और जिस नाम की पर्ची निकलती है। वही उम्मीदवार उस पद के लिए निर्विरोध चुना जाता है। यानी जिसका भी नाम पर्ची पर निकलता है कोई भी उसका विरोध नहीं करता है।

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जिम्मेदारी तय करने के लिए राशि जमा

इस पूरी प्रक्रिया को गंभीर और व्यवस्थित बनाए रखने के लिए उम्मीदवारों से पदों के आधार पर एक निश्चित राशि भी जमा करवाई जाती है। पिछले चुनाव में-

  • प्रधान- 4 लाख रुपये
  • उपप्रधान- 2 लाख रुपये
  • BDC- 1 लाख रुपये
  • वार्ड सदस्य- 50 हजार रुपये

फिर लौटा दी जाती है पूरी रकम

चयनित उम्मीदवार की राशि समिति के पास रहती है, जबकि बाकी प्रतिभागियों की रकम लौटा दी जाती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल गंभीर और जिम्मेदार लोग ही प्रक्रिया में हिस्सा लें।

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गांव के विकास में लगती है राशि

ग्रामीणों का कहना है कि इस प्रक्रिया से एकत्रित धनराशि गांव के आराध्य देवता महासू महाराज के मंदिर फंड में जमा की जाती है। इस फंड का उपयोग केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रास्तों की मरम्मत, पेयजल व्यवस्था, सामुदायिक भवनों के निर्माण और अन्य विकास कार्यों में भी किया जाता है। इस तरह चुनाव प्रक्रिया सीधे तौर पर गांव के विकास से जुड़ जाती है।

गुटबाजी से भाईचारे तक का सफर

ग्रामीण बताते हैं कि पहले पंचायत चुनावों के दौरान गांव में तनाव और गुटबाजी आम बात थी। कई बार रिश्तों में भी खटास आ जाती थी, लेकिन इस सहमति आधारित मॉडल को अपनाने के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। अब गांव में भाईचारा, विश्वास और सहयोग की भावना पहले से ज्यादा मजबूत हुई है।

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खर्च और समय दोनों की बचत

इस पहल से चुनावों में होने वाला अनावश्यक खर्च और समय की बर्बादी भी काफी हद तक कम हुई है। पहले जहां चुनावों में पैसा खर्च होता था, अब वही धन गांव के सामूहिक हित में लगाया जा रहा है। इससे लोगों में सकारात्मक सोच विकसित हुई है और वे खुद को विकास प्रक्रिया का हिस्सा मानने लगे हैं।

देवता के दरबार में लिया संकल्प

ग्रामीणों के अनुसार, इस व्यवस्था को लेकर गांव के लोगों ने देवता महासू महाराज के दरबार में संकल्प लिया है, जिसका सभी पालन करते हैं। यही वजह है कि प्रक्रिया को लेकर कोई विवाद सामने नहीं आता।

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मिसाल कायम कर रही पंचायत

गौरतलब है कि पिछली बार टटियाना पंचायत का गठन बिना किसी चुनावी मुकाबले के हुआ था, जिसने पूरे क्षेत्र में एक नई सोच को जन्म दिया। अब आगामी चुनावों में भी इसी मॉडल को अपनाने की तैयारी चल रही है। यदि यह प्रयोग फिर सफल होता है, तो यह अन्य पंचायतों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है।

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