शिमला। हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों में देरी के बाद अब शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव भी निर्धारित समय पर होने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। प्रदेश के 22 नगर निकायों में दिसंबर 2026 में प्रस्तावित चुनावों पर देरी का साया मंडराने लगा है। पंचायत चुनावों में देरी की वजह चाहे जो भी रही हो, लेकिन इस बार 22 नगर निकायों की चुनावी प्रक्रिया के सामने एक बड़ी प्रशासनिक अड़चन है—राज्य निर्वाचन आयोग में निर्वाचन आयुक्त का पद खाली होना।

 

पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त अनिल खाची के 5 अगस्त को सेवानिवृत्त होने के बाद से अब तक इस पद पर नई नियुक्ति नहीं हो पाई है। दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आयोग के प्रमुख की तैनाती नहीं होने से चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब चुनावों के लिए जरूरी औपचारिकताएं समय रहते पूरी नहीं होंगी, तो दिसंबर में मतदान की तैयारी कैसे पूरी हो पाएगी?

 

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शहरी चुनावों पर भी संकट के बादल

हिमाचल में स्थानीय निकायों के चुनाव समय पर करवाना प्रशासन के सामने एक बार फिर चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। पंचायत चुनावों में पहले ही देरी हो चुकी है और अब शहरी क्षेत्रों में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की अगली परीक्षा सामने है। प्रदेश के 22 नगर निकायों में चुनावी प्रक्रिया समय पर शुरू नहीं हुई, तो यहां भी चुनाव आगे खिसकने की स्थिति बन सकती है।

हालांकि, पंचायत चुनावों और नगर निकायों के चुनावों में देरी के कारण अलग-अलग हैं। नगर निकायों के मामले में फिलहाल प्रमुख चिंता राज्य निर्वाचन आयुक्त के खाली पद और उससे जुड़ी तैयारियों को लेकर है। चुनाव की तारीखों पर अंतिम स्थिति आयोग की नियुक्ति और उसके बाद पूरी होने वाली औपचारिकताओं पर निर्भर करेगी।

 

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22 निकायों में 194 पार्षद चुनने के लिए होना है मतदान

प्रदेश में जिन 22 शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव प्रस्तावित हैं, उनमें 16 नगर पंचायतें, तीन नगर निगम और तीन नगर परिषदें शामिल हैं। इन निकायों में कुल 194 पार्षद पदों के लिए चुनाव होने हैं। इसके अतिरिक्त कुछ निकायों में दो से तीन सीटों पर उपचुनाव भी प्रस्तावित हैं। इन चुनावों के जरिए शहरों और कस्बों के मतदाता अपने वार्डों के प्रतिनिधि चुनेंगे। लेकिन यदि चुनावी तैयारियों में और देरी होती है, तो मतदाताओं को अपने नए पार्षद चुनने के लिए निर्धारित समय से अधिक इंतजार करना पड़ सकता है।

 

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पांच-छह महीने पहले शुरू हो जानी चाहिए चुनाव की तैयारी

नगर निकायों के चुनाव करवाने के लिए केवल मतदान की तारीख तय करना ही पर्याप्त नहीं होता। इससे पहले मतदाता सूचियों को तैयार करने और उनमें जरूरी संशोधन करने, वार्डों से संबंधित व्यवस्थाओं, आरक्षण रोस्टर, मतदान केंद्रों तथा चुनाव कार्यक्रम जैसी कई प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं।

 

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आमतौर पर चुनाव से पांच से छह महीने पहले तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं, ताकि निर्धारित समय पर मतदान करवाने में दिक्कत न आए। दिसंबर 2026 में चुनाव प्रस्तावित होने के बीच निर्वाचन आयुक्त का पद खाली रहने से इन तैयारियों की समयसीमा को लेकर चिंता बढ़ गई है। राज्य निर्वाचन आयोग के प्रमुख के पास चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी महत्वपूर्ण शक्तियां होती हैं। ऐसे में नई नियुक्ति में देरी रहने पर चुनाव कार्यक्रम तैयार करने और अन्य जरूरी कदमों को आगे बढ़ाने में मुश्किल आ सकती है।

मई में भी तैयार था आयोग, लेकिन आरक्षण रोस्टर ने रोकी राह

इन 22 नगर निकायों में चुनाव करवाने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने मई में भी तैयारियां की थीं। हालांकि, उस समय सरकार की ओर से इन निकायों के लिए आरक्षण रोस्टर जारी नहीं किया गया था। इसी बीच नए गठित शहरी स्थानीय निकायों में गठन के दो साल के भीतर चुनाव करवाने का प्रावधान लागू करने के लिए कानून में बदलाव किया गया।

इन परिस्थितियों के चलते मई में चुनाव नहीं हो पाए। अब दिसंबर में चुनाव प्रस्तावित हैं, लेकिन निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति नहीं होने से चुनावी प्रक्रिया को समय पर आगे बढ़ाने को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई है। 

 

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तीन नगर निगमों में चुनाव पर रहेगी राजनीतिक दलों की नजर

इन चुनावों में तीन नगर निगमों का मुकाबला भी खास रहेगा। नगर निगम चुनाव पार्टी चुनाव चिह्नों पर होते हैं, इसलिए इनका महत्व स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं रहता। राजनीतिक दलों के लिए ये चुनाव शहरी मतदाताओं के बीच अपने समर्थन का आकलन करने का अवसर भी होते हैं। दिसंबर 2027 में प्रस्तावित हिमाचल विधानसभा चुनावों से पहले होने वाले नगर निगम चुनावों पर कांग्रेस और भाजपा सहित अन्य दलों की नजर रहेगी। हालांकि, चुनाव समय पर होते हैं या आगे खिसकते हैं, यह फिलहाल निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति और चुनावी तैयारियों की प्रगति से जुड़ा सवाल है।

एडमिनिस्ट्रेटर संभाल रहे हैं निकायों की जिम्मेदारी

वर्तमान में इन नगर निकायों का कामकाज प्रशासकों के माध्यम से चलाया जा रहा है। यदि निर्धारित समय पर चुनाव नहीं हो पाते हैं, तो प्रशासकों के जरिए प्रशासनिक व्यवस्था आगे भी जारी रह सकती है। इसका सीधा संबंध स्थानीय नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं से है। सड़क की मरम्मत, सफाई व्यवस्था, पेयजल आपूर्ति, स्ट्रीट लाइट, पार्किंग, भवनों के नक्शे और दूसरे विकास कार्यों जैसे मुद्दे आमतौर पर वार्ड पार्षदों के माध्यम से नगर निकायों तक पहुंचते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में नागरिकों को अपनी समस्याएं संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के सामने उठानी पड़ सकती हैं।

 

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चुनाव टले तो स्थानीय प्रतिनिधित्व पर पड़ेगा असर

नगर निकायों के चुनावों में देरी का सबसे बड़ा प्रभाव स्थानीय लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। वार्डों के मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनने से वंचित रह सकते हैं और पार्षदों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय करने की व्यवस्था बहाल होने में समय लग सकता है। 

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